श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 28

 
श्लोक
तं श्येनवेगं शतचन्द्रवर्त्मभि
श्चरन्तमच्छिद्रमुपर्यधो हरि: ।
कृत्वाट्टहासं खरमुत्स्वनोल्बणं
निमीलिताक्षं जगृहे महाजव: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको (हिरण्यकशिपु को); श्येन-वेगम्—बाज जैसी गति वाले; शत-चन्द्र-वर्त्मभि:—अपनी तलवार तथा एक सौ चन्द्रमा जैसे चिह्नों से युक्त ढाल को भाँजते हुए; चरन्तम्—गति करते हुए; अच्छिद्रम्—किसी तरह का स्थान छोड़े बिना; उपरि- अध:—ऊपर तथा नीचे; हरि:—भगवान्; कृत्वा—करते हुए; अट्ट-हासम्—जोर की हँसी; खरम्—अत्यन्त तीखी; उत्स्वन- उल्बणम्—इस तीव्र गर्जन से अत्यन्त भयभीत; निमीलित—बन्द; अक्षम्—आँखें; जगृहे—पकड़ लिया; महा-जव:—अत्यन्त शक्तिशाली भगवान् ने ।.
 
अनुवाद
 
 अट्टहास करते हुए अत्यन्त प्रबल तथा शक्तिशाली भगवान् नारायण ने हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया जो किसी प्रकार का वार करने की संभावना छोड़े बिना अपनी तलवार-ढाल से अपनी रक्षा कर रहा था। वह कभी बाज की गति से आकाश में चला जाता और कभी पृथ्वी पर चला आता था। वह नृसिंहदेव की हँसी के भय से अपनी आखें बन्द किये था।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥