श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 32

 
श्लोक
सटावधूता जलदा: परापतन्
ग्रहाश्च तद् द‍ृष्टिविमुष्टरोचिष: ।
अम्भोधय: श्वासहता विचुक्षुभु-
र्निर्ह्रादभीता दिगिभा विचुक्रुशु: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
सटा—नृसिंह देव की जटा से; अवधूता:—हिले हुए; जलदा:—बादल; परापतन्—बिखरे हुए; ग्रहा:—चमकीले ग्रह; च— तथा; तत्-दृष्टि—पैनी दृष्टि से; विमुष्ट—निकाल ली गई; रोचिष:—जिसका तेज; अम्भोधय:—समुद्रों का जल; श्वास-हता:— नृसिंह देव के श्वास से प्रताडि़त; विचुक्षुभु:—क्षुब्ध हो उठा; निर्ह्राद-भीता:—नृसिंह देव की गर्जना से भयभीत; दिगिभा:— दिशाओं की रखवाली करने वाले सारे हाथी; विचुक्रुशु:—चिग्घाड़ उठे ।.
 
अनुवाद
 
 नृसिंह देव के सिर के बालों से बादल हिलकर इधर-उधर बिखर गये। उनकी जलती आँखों से आकाश के नक्षत्रों का तेज मंद पड़ गया और उनके श्वास से समुद्र क्षुब्ध हो उठे। उनकी गर्जना से संसार के सारे हाथी भय से चिग्घाडऩे लगे।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता (१०.४१) में कहा है—
यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तद् तद् एवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥

“तुम जान लो कि समस्त सुन्दर गौरवशाली तथा शक्तिशाली सृष्टि मेरे तेज के एक स्फुलिंग से ही प्रकट होती है।” आकाश में ग्रहों तथा नक्षत्रों का प्रकाश भगवान् के तेज का आंशिक प्राकट्य है। विभिन्न जीवों में अनेक अद्भुत गुण पाये जाते हैं, किन्तु जितनी भी अद्वितीय वस्तुएँ पाई जाती हैं, वे भगवान् के तेजस् की अंश मात्र हैं। समुद्रों की उत्ताल तरंगें तथा भगवान् की सृष्टि के अनेक आश्चर्य उस समय नगण्य बन जाते हैं जब वे अपने विशेष रूप में इस जगत में अवतरित होते हैं। उनके साकार सर्वविजयी दिव्य गुणों की तुलना में सारी वस्तुएँ तुच्छ हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥