श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 34

 
श्लोक
तत: सभायामुपविष्टमुत्तमे
नृपासने सम्भृततेजसं विभुम् ।
अलक्षितद्वैरथमत्यमर्षणं
प्रचण्डवक्त्रं न बभाज कश्चन ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; सभायाम्—सभाभवन में; उपविष्टम्—बैठे हुए; उत्तमे—श्रेष्ठ; नृप-आसने—सिंहासन पर जिस पर हिरण्यकशिपु बैठता था; सम्भृत-तेजसम्—पूर्ण तेजोमय; विभुम्—परमेश्वर को; अलक्षित-द्वैरथम्—जिनका प्रतिद्वन्द्वी या शत्रु दिख नहीं रहा था; अति—अत्यन्त; अमर्षणम्—(अपने क्रोध के कारण) भयानक; प्रचण्ड—भयंकर; वक्त्रम्—मुखमंडल; न—नहीं; बभाज—पूजे; कश्चन—कोई ।.
 
अनुवाद
 
 अपना पूर्ण तेज तथा भंयकर मुखमंडल दिखलाते हुए नृसिंह देव अत्यन्त क्रुद्ध होने तथा अपने बल एवं ऐश्वर्य का सामना करने वाले किसी को न पाकर सभा भवन में राजा के श्रेष्ठतम सिंहासन पर जा बैठे। भय तथा आज्ञाकारिता के कारण किसी में साहस न हुआ कि सामने आकर भगवान् की सेवा करे।
 
तात्पर्य
 जब हिरण्यकशिपु के सिंहासन पर भगवान् बैठ गये तो किसी ने विरोध नहीं किया, यहाँ तक कि हिरण्यकशिपु की ओर से कोई शत्रु भगवान् से लडऩे नहीं आया। इसका अर्थ है कि असुरों ने भगवान् की श्रेष्ठता तुरन्त स्वीकार कर ली। दूसरी बात यह है कि यद्यपि हिरण्यकशिपु भगवान् को अपना कट्टर शत्रु मानता था, किन्तु वैकुण्ठ में वह उनका अत्यन्त आज्ञाकारी दास था, अतएव हिरण्यकशिपु द्वारा इतने श्रम से प्राप्त किये गये सिंहासन पर भगवान् बैठने से तनिक भी हिचके नहीं। इस प्रसंग में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि कभी-कभी बड़े-बड़े सन्त तथा ऋषि वैदिक मंत्रों तथा
तंत्रों के द्वारा भगवान् को महत्त्वपूर्ण आसन प्रदान करते हैं, किन्तु तो भी भगवान् उन आसनों पर नहीं विराजते। चूँकि हिरण्यकशिपु पहले वैकुण्ठ-द्वार का रक्षक जय के रूप में था और यद्यपि वह ब्राह्मणों के शाप से पतित होकर असुर बना था और यद्यपि हिरण्यकशिपु के रूप में उसने भगवान् को कभी कोई वस्तु अर्पित नहीं की थी तो भी भगवान् अपने भक्त तथा दास के प्रति इतने वत्सल थे कि उन्होंने हिरण्यकशिपु द्वारा स्थापित सिंहासन पर प्रसन्नतापूर्वक आसन ग्रहण किया। इस प्रसंग में यह समझ लेना होगा कि भक्त अपने जीवन की किसी भी परिस्थिति में भाग्यशाली होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥