श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 40

 
श्लोक
श्रीब्रह्मोवाच
नतोऽस्म्यनन्ताय दुरन्तशक्तये
विचित्रवीर्याय पवित्रकर्मणे ।
विश्वस्य सर्गस्थितिसंयमान् गुणै:
स्वलीलया सन्दधतेऽव्ययात्मने ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-ब्रह्मा उवाच—ब्रह्माजी ने कहा; नत:—नतमस्तक; अस्मि—हूँ; अनन्ताय—अनन्त भगवान् को; दुरन्त—जिसका अन्त ढूँढ़ पाना कठिन है; शक्तये—विभिन्न शक्तियों से युक्त; विचित्र-वीर्याय—नाना प्रकार के पराक्रम से युक्त; पवित्र-कर्मणे—जिनके कर्म का फल नहीं होता (चाहे बुरा ही कर्म क्यों न करें, वे भौतिक गुण से दूषित नहीं होते); विश्वस्य—विश्व की; सर्ग—सृष्टि; स्थिति—पालन; संयमान्—तथा संहार; गुणै:—गुणों से; स्व-लीलया—आसानी से; सन्दधते—सम्पन्न करता है; अव्यय- आत्मने—जिनके व्यक्तित्व का ह्रास नहीं होता ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने प्रार्थना की: हे प्रभु, आप अनन्त हैं और आपकी शक्ति का कोई अन्त नहीं है। कोई भी आपके पराक्रम तथा अद्भुत प्रभाव का अनुमान नहीं लगा सकता, क्योंकि आपके कर्म माया द्वारा दूषित नहीं होते। आप भौतिक गुणों से सहज ही ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं लेकिन तो भी आप अव्यय बने रहते हैं। अतएव मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवान् के कार्यकलाप सदैव अद्भुत होते हैं। यद्यपि जय तथा विजय उनके पार्षद और विश्वस्त मित्र थे, किन्तु उन्हें शापवश असुरों का शरीर धारण करना पड़ा। यही नहीं, ऐसे ही एक असुर-परिवार में प्रह्लाद महाराज को महाभावगत का आचरण प्रदर्शित करने के लिए जन्म धारण करना पड़ा और तब भगवान् को उसी असुर का वध करने के लिए नृसिंह देव का रूप धारण करना पड़ा जिसने भगवान् की इच्छा से असुर-कुल में जन्म लिया था। अतएव ऐसा कौन होगा जो भगवान् के दिव्य कार्यकलापों को समझ सके? उनके कार्यकलापों
की कौन कहे, उनके दासों के कार्यकलापों तक को समझना कठिन है। श्रीचैतन्य-चरितामृत (मध्य २३.३९) में कहा गया है ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय—भगवान् के दासों के कार्यकलापों को कोई नहीं जान सकता। अतएव भगवान् के कार्यकलापों के विषय में क्या कहा जा सकता है? यह कौन समझ सकता है कि कृष्ण किस तरह सम्पूर्ण जगत को लाभान्वित कर रहे हैं। भगवान् को दुरन्त शक्ति कहकर सम्बोधित किया गया है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति उनकी शक्तियों को तथा उनकी कार्यविधि को नहीं समझ सकता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥