श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 44

 
श्लोक
श्रीपितर ऊचु:
श्राद्धानि नोऽधिबुभुजे प्रसभं तनूजै-
र्दत्तानि तीर्थसमयेऽप्यपिबत्तिलाम्बु ।
तस्योदरान्नखविदीर्णवपाद्य आर्च्छत्
तस्मै नमो नृहरयेऽखिलधर्मगोप्त्रे ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-पितर: ऊचु:—पितृलोक के वासियों ने कहा; श्राद्धानि—श्राद्ध कर्म (मृत पुरुखों को एक विशेष विधि से प्रदत्त भोज्य सामग्री); न:—हमारा; अधिबुभुजे—भोग किया; प्रसभम्—बल द्वारा; तनूजै:—अपने पुत्रों-पौत्रों द्वारा; दत्तानि—प्रदत्त; तीर्थ समये—तीर्थ स्थानों में स्नान करते समय; अपि—भी; अपिबत्—पिया; तिल-अम्बु—तिल के साथ जलांजलि; तस्य—उस असुर के; उदरात्—पेट से; नख-विदीर्ण—नाखून से फाड़ा गया; वपात्—जिसकी आँतों की चमड़ी; य:—जिस (भगवान्) ने; आर्च्छत्—प्राप्त किया; तस्मै—उसको (भगवान् को); नम:—नमस्कार; नृ-हरये—नृहरि को जो आधे सिंह तथा आधे पुरुष के रूप में प्रकट हुए; अखिल—विश्वजनीन; धर्म—धार्मिक नियम; गोप्त्रे—पालन करने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 पितृलोक के वासियों ने प्रार्थना की: हम ब्रह्माण्ड के धार्मिक नियमों के पालनकर्ता भगवान् नृसिंह देव को सादर नमस्कार करते हैं। आपने उस असुर को मार डाला है, जो हमारे श्राद्ध के अवसर पर हमारे पुत्रों-पौत्रों द्वारा अर्पित बलि को छीनकर खा जाता था और तीर्थस्थलों पर अर्पित की जाने वाली तिलांजलि को पी जाता था। हे प्रभु, आपने इस असुर को मारकर अपने नाखूनों से इसके पेट को विदीर्ण करके उसमें से समस्त चुराई हुई सामग्री निकाल ली है। अतएव हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 समस्त गृहस्थों का कर्तव्य है कि अपने दिवंगत पूर्वजों को अन्न की बलि दें, किन्तु हिरण्यकशिपु के काल में यह प्रथा रोक दी गई थी, कोई भी व्यक्ति अपने पितरों को श्राद्ध पिण्डदान नहीं दे सकता था। अतएव जब आसुरी शासन होता है, तो सारे वैदिक नियम अस्त-व्यस्त कर दिये जाते हैं, सारे
यज्ञोत्सव रोक दिये जाते हैं और यज्ञ के सारे साधन आसुरी सरकार द्वारा छीन लिए जाते हैं। इससे अव्यवस्था फैल जाती है और फलस्वरूप सारा संसार नरक बन जाता है। अतएव जब सारे असुर नृसिंह देव द्वारा मार डाले जाते हैं, तो हर व्यक्ति को चैन मिलता है, चाहे वह किसी भी लोक का वासी हो।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥