श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 51

 
श्लोक
श्रीचारणा ऊचु:
हरे तवाङ्‌घ्रिपङ्कजं भवापवर्गमाश्रिता: ।
यदेष साधुहृच्छयस्त्वयासुर: समापित: ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-चारणा: ऊचु:—चारणलोक के निवासियों ने कहा; हरे—हे भगवान्; तव—तुम्हारे; अङ्घ्रि-पङ्कजम्—चरणकमल; भव- अपवर्गम्—संसार के कल्मष से मुक्त होने के लिए एकमात्र शरण; आश्रिता:—शरणागत; यत्—क्योंकि; एष:—यह; साधु हृत्-शय:—समस्त ईमानदार मनुष्यों के हृदयों में संकट; त्वया—आपके द्वारा; असुर:—असुर (हिरण्यकशिपु); समापित:— मार डाला गया ।.
 
अनुवाद
 
 चारणलोक के निवासियों ने कहा : हे प्रभु, आपने उस असुर हिरण्यकशिपु को विनष्ट कर दिया जो सारे निष्कपट पुरुषों के हृदयों में आतंक बना हुआ था। अब हमें शान्ति मिली है। हम सभी आपके उन चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, जो बद्धजीव को भौतिक कल्मष से मुक्ति दिलानेवाले हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपने नरहरि या नृसिंह देव रूप में उन दुष्टों का वध करने के लिए सदैव उद्यत रहते हैं, जो निष्कपट भक्तों के मनों में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। भक्तों को कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रसार करने
के लिए संसार भर में अनेक संकटों तथा अवरोधों का सामना करना होता है किन्तु जो आज्ञाकारी दास भक्तिपूर्वक भगवान् का उपदेश देता है उसे यह जान लेना चाहिए कि नृसिंह देव सदैव उसके रक्षक होते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥