श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 53

 
श्लोक
श्रीकिम्पुरुषा ऊचु:
वयं किम्पुरुषास्त्वं तु महापुरुष ईश्वर: ।
अयं कुपुरुषो नष्टो धिक्कृत: साधुभिर्यदा ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-किम्पुरुषा: ऊचु:—किम्पुरुष लोक के निवासियों ने कहा; वयम्—हम; किम्पुरुषा:—किम्पुरुष लोक के वासी अथवा क्षुद्र प्राणी; त्वम्—आप; तु—फिर भी; महा-पुरुष:—परमेश्वर; ईश्वर:—परम नियन्ता; अयम्—यह; कु-पुरुष:—अत्यन्त पापी पुरुष, हिरण्यकशिपु; नष्ट:—वध किया गया; धिक्-कृत:—तिरस्कृत होकर; साधुभि:—साधु पुरुषों द्वारा; यदा—जब ।.
 
अनुवाद
 
 किम्पुरुषलोक के वासियों ने कहा : हम क्षुद्र जीव हैं और आप परम नियामक महापुरुष हैं। अतएव हम आपकी समुचित स्तुति कैसे कर सकते हैं? जब भक्तों ने तंग आकर इस असुर का तिरस्कार कर दिया तो आपने इसका वध कर दिया।
 
तात्पर्य
 भगवान् ने स्वयं भगवद्गीता (४.७-८) में इस धरा पर अपने प्राकट्य का कारण बतलाया है—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

“जब-जब धार्मिक सिद्धान्तों का ह्रास होता है और अधर्म में उल्लेखनीय वृद्धि होती है उस समय मैं स्वयं अवतार लेता हूँ। मैं पवित्रात्माओं का उद्धार करने तथा दुष्टों का संहार करने तथा साथ ही धार्मिक सिद्धान्तों को पुन:स्थापित करने के लिए युग-युग में अवतरित होता हूँ।” भगवान् दो प्रकार के कार्य करने के लिए अवतरित होते हैं—असुरों को मारने तथा भक्तों की रक्षा करने। जब भक्त असुरों द्वारा अत्यधिक सताये जाते हैं, तो भक्तों की रक्षा करने के लिए भगवान् विविध अवतारों में प्रकट होते हैं। प्रह्लाद महाराज के चरण-चिह्नों पर चलने वाले भक्तों को अभक्तों के आसुरी कार्यकलापों से कभी विचलित नहीं होना चाहिए, अपितु उन्हें भगवान् के सत्यनिष्ठ भक्त के रूप में अपने नियमों पर अटल रहना चाहिए और आश्वस्त रहना चाहिए कि आसुरी कार्यकलापों से उनकी भक्ति रुकेगी नहीं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥