श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 6

 
श्लोक
क्रुद्धस्य यस्य कम्पन्ते त्रयो लोका: सहेश्वरा: ।
तस्य मेऽभीतवन्मूढ शासनं किं बलोऽत्यगा: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
क्रुद्धस्य—क्रुद्ध होने पर; यस्य—जिसके; कम्पन्ते—काँपते हैं; त्रय: लोका:—तीनों लोक; सह-ईश्वरा:—अपने-अपने नायकों समेत; तस्य—उस; मे—मेरे (हिरण्यकशिपु के); अभीत-वत्—निर्भीक; मूढ—धूर्त; शासनम्—आदेश; किम्—क्या; बल:—बल; अत्यगा:—अति हो गई है ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे दुष्ट पुत्र प्रह्लाद! तुम जानते हो कि जब मैं क्रुद्ध होता हूँ तो तीनों लोक अपने-अपने नायकों सहित काँपने लगते हैं। तो फिर तुम किसके बल पर इतने धृष्ट हो गये हो कि तुम निर्भीक होकर मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो?
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्त तथा भगवान् के मध्य अत्यन्त मधुर सम्बन्ध होता है। भक्त कभी भी अपने को शक्तिशाली नहीं मानता, उल्टे उसे इतना दृढ़ विश्वास रहता है कि समस्त संकटों से कृष्ण अपने भक्तों की रक्षा करेंगे, अतएव वह कृष्ण के चरणकमलों पर पूरी तरह समर्पित हो जाता है। भगवान् कृष्ण स्वयं भगवद्गीता (९.३१) में कहते हैं—कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति—हे कुन्ती पुत्र! तुम निर्भीक होकर घोषित कर दो कि मेरा भक्त कभी मरता नहीं। भगवान् ने स्वयं यह घोषणा न करके अर्जुन से घोषित करने का अनुरोध किया, क्योंकि कभी-कभी कृष्ण अपना विचार बदल देते हैं, अतएव लोग उन पर विश्वास नहीं भी कर सकते थे। इस तरह कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वह यह घोषित करे कि भगवद्भक्त कभी विनष्ट नहीं होता।
हिरण्यकशिपु हैरान था कि उसका पाँच वर्ष का बालक इतना निर्भीक कैसे हो सकता है कि वह अपने इतने महान् तथा शक्तिशाली पिता के आदेश की परवाह न करे। भक्त भगवान् के अतिरिक्त अन्य किसी के आदेश का पालन नहीं कर सकता। ऐसी है भक्त की स्थिति। हिरण्यकशिपु समझ गया कियह बालक हो न हो अत्यन्त शक्तिशाली है, क्योंकि वह उसके आदेशों की परवाह नहीं कर रहा था। अतएव हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र से पूछा—किम् बल:—तुमने मेरे आदेश का उल्लंघन कैसे किया? तुमने किसके बल पर ऐसा किया है?
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥