श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 7

 
श्लोक
श्रीप्रह्राद उवाच
न केवलं मे भवतश्च राजन्
स वै बलं बलिनां चापरेषाम् ।
परेऽवरेऽमी स्थिरजङ्गमा ये
ब्रह्मादयो येन वशं प्रणीता: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-प्रह्राद: उवाच—प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया; न—नहीं; केवलम्—केवल; मे—मेरा; भवत:—आपका; च—तथा; राजन्—हे राजा; स:—वह; वै—निस्सन्देह; बलम्—बल; बलिनाम्—बलियों के; च—तथा; अपरेषाम्—अन्यों का; परे— सम्माननीय; अवरे—अधीन; अमी—वे; स्थिर-जङ्गमा:—चल या अचल जीव; ये—जो; ब्रह्म-आदय:—ब्रह्मा इत्यादि; येन— जिसके द्वारा; वशम्—वश में; प्रणीता:—लाया गया ।.
 
अनुवाद
 
 प्रह्लाद महाराज ने कहा, हे राजन्, आप जिस बल के मेरे स्रोत को जानना चाह रहे हैं वह आपके बल का भी स्रोत है। निस्सन्देह, समस्त प्रकार के बलों का मूल स्रोत एक ही है। वह न केवल आपका या मेरा बल है, अपितु सबों का एकमात्र बल है। उसके बिना किसी को कोई बल नहीं मिल सकता। चाहे चल हो या अचल, उच्च हो या नीच, ब्रह्मा समेत सारे जीव भगवान् के बल द्वारा नियंत्रित हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् कृष्ण भगवद्गीता (१०.४१) में कहते हैं—
यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥

“जान लो कि सारी सुन्दर, यशस्वी तथा शक्तिशाली सृष्टियाँ मेरे तेज के एक स्फुलिंग से प्रकट होती हैं।” प्रह्लाद महाराज द्वारा इस की पुष्टि की जा रही है। यदि कोई मनुष्य कहीं कोई अद्वितीय बल या शक्ति देखता है, तो वह भगवान् से उद्भूत हुई है। उदाहरणार्थ, अग्नि की कई कोटियाँ हैं, किन्तु वे सभी सूर्य से ऊष्मा तथा प्रकाश प्राप्त करती हैं। इसी प्रकार सारे जीव, चाहे बड़े हों या छोटे, भगवान् की दया पर निर्भर हैं। मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य है कि वह उनकी शरण में जाये, क्योंकि वह दास है और कभी भी स्वामी का स्वतंत्र पद प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य स्वामी का पद स्वामी की दया से ही प्राप्त कर सकता है, स्वतंत्र रूप से नहीं जब तक कोई इस दर्शन को समझ नहीं लेता तब तक वह मूढ बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह बुद्धिमान नहीं होता। जिन मूढों या गधों में बुद्धि नहीं होती वे भगवान् की शरण में नहीं जा सकते।

जीव की अधीन अवस्था समझने में लाखों जन्म लग जाते हैं, किन्तु जब कोई वास्तव में विज्ञ हो जाता है, तो वह भगवान् की शरण में जाता है। भगवान् भगवद्गीता (७.१९) में कहते हैं— बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

“जो जीव वास्तव में ज्ञानी होता है, वह अनेक जन्म-जन्मांतरों के बाद मुझे समस्त कारणों का कारण समझ कर मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।” प्रह्लाद महाराज महात्मा थे, अतएव उन्होंने भगवान् के चरणकमलों में पूर्ण आत्म-समर्पण कर दिया था। उन्हें दृढ़ विश्वास था कि उनके कृष्ण समस्त परिस्थितियों में उन्हें सुरक्षा प्रदान करेंगे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥