श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 8

 
श्लोक
स ईश्वर: काल उरुक्रमोऽसा-
वोज: सह: सत्त्वबलेन्द्रियात्मा ।
स एव विश्वं परम: स्वशक्तिभि:
सृजत्यवत्यत्ति गुणत्रयेश: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (भगवान्); ईश्वर:—परम नियन्ता; काल:—काल; उरुक्रम:—भगवान् जिनके सारे कार्य असाधारण होते हैं; असौ—वे ही; ओज:—इन्द्रियों की शक्ति; सह:—मन की शक्ति; सत्त्व—स्थैर्य; बल—शारीरिक शक्ति; इन्द्रिय—तथा इन्द्रियों का; आत्मा—आत्मा; स:—वह; एव—निस्सन्देह; विश्वम्—सारा विश्व; परम:—परम; स्व-शक्तिभि:—अपनी विविध दिव्य शक्तियों से; सृजति—सृजन करता है; अवति—पालन करता है; अत्ति—संहार कर देता है; गुण-त्रय-ईश:—तीनों गुणों का स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 परम नियन्ता एवं काल रूप भगवान् इन्द्रियों के बल, मन के बल, शरीर के बल तथा इन्द्रियों के प्राण हैं। उनका प्रभाव असीम है। वे समस्त जीवों में श्रेष्ठ तथा प्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता हैं। वे अपनी शक्ति से इस ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि यह भौतिक जगत तीनों गुणों द्वारा चलायमान होता है और चूँकि भगवान् उनका
स्वामी है अतएव भगवान् इस भौतिक जगत का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥