श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
एवं सुरादय: सर्वे ब्रह्मरुद्रपुर: सरा: ।
नोपैतुमशकन्मन्युसंरम्भं सुदुरासदम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद उवाच—नारद मुनि ने कहा; एवम्—इस प्रकार; सुर-आदय:—देवताओं का समूह; सर्वे—सारे; ब्रह्म-रुद्र-पुर: सरा:—ब्रह्मा तथा शिव द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाकर; न—नहीं; उपैतुम्—भगवान् के समक्ष जाने के लिए; अशकन्—समर्थ; मन्यु-संरम्भम्—अत्यन्त क्रुद्ध होकर; सु-दुरासदम्—जिन तक पहुँच पाना दुष्कर है (नृसिंहदेव), उन्हें ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : ब्रह्मा, शिव इत्यादि अन्य बड़े-बड़े देवताओं का साहस न हुआ कि वे भगवान् के समक्ष जायँ, क्योंकि उस समय वे अत्यन्त क्रुद्ध थे।
 
तात्पर्य
 श्रील नरोत्तम दास ठाकुर ने प्रेम-भक्ति-चन्द्रिका में गाया है—‘क्रोध’ भक्त-द्वेषि-जने— क्रोध का प्रयोग उस असुर को दण्डित करने के लिए किया जाना चाहिए जो भक्तों से ईर्ष्या करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य इन सबों का भगवान् तथा उनके भक्त के लिए समुचित उपयोग है। भगवद्भक्त कभी भी भगवान् या अन्य भगवद्भक्तों की निन्दा नहीं सहन कर सकता और न भगवान् ही भक्त की निन्दा सह सकते हैं। इस प्रकार नृसिंहदेव
इतने अधिक क्रुद्ध थे कि ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े-बड़े देवता और लक्ष्मी जी तक, जो कि भगवान् की नित्य संगिनी हैं, उनकी प्रशंसा तथा यशोगान द्वारा उन्हें शान्त नहीं कर सके। कोई भी भगवान् के क्रोध को शान्त नहीं कर सका, किन्तु क्योंकि भगवान् अपना प्यार प्रह्लाद महाराज को जताना चाहते थे, इसलिए सारे देवताओं तथा भगवान् के समक्ष उपस्थित अन्य जनों ने प्रह्लाद महाराज को ही उन्हें शान्त करने के लिए आगे कर दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥