श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 12

 
श्लोक
तस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य
सर्वात्मना महि गृणामि यथा मनीषम् ।
नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्ट:
पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अतएव; अहम्—मैं; विगत-विक्लव:—अयोग्य होने का चिन्तन छोडक़र; ईश्वरस्य—ईश्वर का; सर्व-आत्मना—पूर्ण शरणागत होकर; महि—यश; गृणामि—कीर्तन या वर्णन करूँगा; यथा मनीषम्—अपनी बुद्धि के अनुसार; नीच:—यद्यपि निम्न कुल (मेरे पिता असुर रहे और समस्त सद्गुणों से विहीन) में उत्पन्न; अजया—अज्ञान के कारण; गुण-विसर्गम्—भौतिक जगत (जिसमें जीव गुणों के कल्मष के अनुसार जन्म लेता है); अनुप्रविष्ट:—के भीतर प्रविष्ट; पूयेत—शुद्ध हो; येन—जिससे (भगवान् के यश से); हि—निस्सन्देह; पुमान्—मनुष्य; अनुवर्णितेन—कीर्तन किये जाने या पाठ किये जाने पर ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव यद्यपि मैंने असुरकुल में जन्म लिया है, तो भी निस्सन्देह, जहाँ तक मेरी बुद्धि जाती है मैं पूरे प्रयास से भगवान् की प्रार्थना करूँगा। जो भी व्यक्ति अज्ञान के कारण इस भौतिक जगत में प्रविष्ट होने को बाध्य हुआ है, वह भौतिक जीवन को पवित्र बना सकता है यदि वह भगवान् की प्रार्थना करे और उनके यश का श्रवण करे।
 
तात्पर्य
 यह स्पष्ट है कि भक्त को उच्च कुल में जन्म लेने, धनी होने, राजसी वृत्ति का या सुन्दर होने की आवश्यकता नहीं है। इनमें से कोई भी गुण किसी को भक्ति में नहीं लगा सकता। उसे तो भक्ति में ऐसा अनुभव होना चाहिए “ईश्वर महान् हैं और मैं अत्यन्त लघु हूँ। अतएव मेरा कर्तव्य है कि मैं भगवान् के प्रति प्रार्थना करूँ।” इसी आधार पर भगवान् को समझा जा सकता है और उनकी सेवा की जा सकती है। भगवान् भगवद्गीता (१८.५५) में कहते हैं—
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

“मनुष्य केवल भक्ति द्वारा परम पुरुष को यथारूप में समझ सकता है और जब वह ऐसी भक्ति द्वारा भगवान् की पूर्ण चेतना में होता है, तो वह भगवद्धाम में प्रवेश कर सकता है।” इस तरह प्रह्लाद महाराज ने अपने भौतिक पद का विचार न करते हुए भगवान् की स्तुति करने का निश्चय किया।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥