श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 15

 
श्लोक
नाहं बिभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य-
जिह्वार्कनेत्रभ्रुकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात् ।
आन्त्रस्रज: क्षतजकेशरशङ्कुकर्णा-
न्निर्ह्रादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अहम्—मैं; बिभेमि—भयभीत हूँ; अजित—हे अजेय, परम विजयी पुरुष; ते—तुम्हारा; अति—अत्यन्त; भयानक— भयावना; आस्य—मुख; जिह्वा—जीभ; अर्क-नेत्र—सूर्य की तरह चमकती आँखें; भ्रुकुटी—क्रुद्ध भौहें; रभस—प्रबल; उग्र दंष्ट्रात्—भयावने दाँत; आन्त्र-स्रज:—आँतों की माला पहने; क्षतज—रक्त से सने; केशर—गर्दन के बाल; शङ्कु-कर्णात्—बर्छे जैसे पैने कान; निर्ह्राद—गर्जना (आपके द्वारा की गई) से; भीत—डरा हुआ; दिगिभात्—जिससे बड़े-बड़े हाथी भी; अरि भित्—शत्रु को फाडऩे वाला; नख-अग्रात्—अपने नाखून के अग्र भाग से ।.
 
अनुवाद
 
 हे अजित भगवान्, मैं न तो आपके भयानक मुख तथा जीभ से, न ही सूर्य के समान चमकीली आँखों से या टेढ़ी भौहों से भयभीत हूँ। मैं आपके तेज नुकीले दाँतों से, आँतों की माला से, रक्त रंजित गर्दन के बालों से या बर्छे जैसे पैने कानों से भी नहीं डर रहा हूँ। न ही मैं आपके सिंहनाद से भयभीत हूँ जिससे हाथी भाग कर दूर चले जाते हैं। न मैं आपके नाखूनों से भयभीत हूँ जो आपके शत्रु को मारने के निमित्त हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् नृसिंहदेव का भयङ्कर स्वरूप अभक्तों के लिए निश्चय ही अत्यन्त घातक था किन्तु प्रह्लाद महाराज ऐसे भयावह स्वरूप से तनिक भी विचलित नहीं होने वाले नहीं थे। सिंह अन्य पशुओं के लिए अत्यन्त भयावह होता है, किन्तु सिंह शावक उससे तनिक भी भयभीत नहीं होते। सागर का जल स्थल के समस्त जीवों के लिए अत्यन्त भयानक लगता है, लेकिन सागर में रहने वाली एक छोटी सी मछली भी उसमें निर्भय विचरण करती है। क्यों? क्योंकि छोटी मछली ने विशाल
सागर की शरण ले रखी है। कहा जाता है कि बड़े-बड़े हाथी नदी की बाढ़ में बह जाते हैं, किन्तु छोटी मछलियाँ धारा के विरुद्ध तैरती रहती हैं। अतएव यद्यपि दुष्कृति लोगों को मारने के लिए भगवान् कभी-कभी भयानक रूप धारण कर लेते हैं, किन्तु भक्तगण सदा उन्हें पूजते हैं। केशव धृतनरहरिरूप जय जगदीश हरे। भक्तों को भगवान् की पूजा करने में सदैव आनन्द आता है और वे उनके किसी भी रूप का, चाहे वह मनोहर हो या भयावह, यशोगान करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥