श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 21

 
श्लोक
माया मन: सृजति कर्ममयं बलीय:
कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंस: ।
छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं
संसारचक्रमज कोऽतितरेत् त्वदन्य: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
माया—भगवान् की बहिरंगा शक्ति; मन:*—मन; सृजति—उत्पन्न करती है; कर्म-मयम्—हजारों इच्छाएँ उत्पन्न करके उसके अनुसार कर्म करती हुई; बलीय:—अत्यन्त शक्तिशाली, दुर्जेय; कालेन—समय द्वारा; चोदित-गुण—जिनके तीनों गुण विक्षुब्ध होते हैं; अनुमतेन—कृपादृष्टि से अनुमति प्राप्त (काल); पुंस:—भगवान् कृष्ण के अंश विष्णु का; छन्द:-मयम्—वेदों के निर्देशों से प्रभावित; यत्—जो; अजया—अज्ञान अंधकार के कारण; अर्पित—चढ़ाया गया; षोडश—सोलह; अरम्—तीलियाँ; संसार-चक्रम्—विभिन्न योनियों में बारम्बार जन्म-मृत्यु का चक्र (पहिया); अज—हे अजन्मा; क:—ऐसा कौन है; अतितरेत्—बाहर निकलने में समर्थ; त्वत्-अन्य:—आपके चरणकमलों की शरण लिए बिना ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, हे परम शाश्वत, आपने अपने स्वांश का विस्तार करके काल द्वारा क्षुब्ध होने वाली अपनी बहिरंगा शक्ति के द्वारा जीवों के सूक्ष्म शरीरों की सृष्टि की है। इस प्रकार मन जीव को अनन्त प्रकार की इच्छाओं में फाँस लेता है जिन्हें कर्मकाण्ड के वैदिक आदेशों तथा सोलह तत्त्वों के द्वारा पूरा किया जाना होता है। भला ऐसा कौन है, जो आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण किये बिना इस बन्धन से छूट सके?
 
तात्पर्य
 यदि हर वस्तु में भगवान् का हाथ रहे तो भौतिक बन्धन से छूटकर आध्यात्मिक आनन्दमय जीवन में जाने का प्रश्न कहाँ उठता है? निस्सन्देह, यह तथ्य है कि कृष्ण प्रत्येक वस्तु के स्रोत हैं जैसाकि कृष्ण स्वयं भगवद्गीता में कहते हैं (अहं सर्वस्य प्रभव:)। भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों के सारे कार्यकलाप परमेश्वर के आदेशों से भौतिक या आध्यात्मिक प्रकृति द्वारा सम्पन्न होते हैं। जैसाकि भगवद्गीता (९.१०) में आगे भी पुष्टि हुई है—मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्—भगवान् के आदेश के बिना प्रकृति कुछ भी नहीं कर सकती, वह स्वतंत्रतापूर्वक कार्यशील नहीं हो सकती। अतएव प्रारम्भ में जीव ने भौतिक शक्ति का भोग करना चाहा और भगवान् कृष्ण ने जीव को सारी सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से इस भौतिक जगत की सृष्टि की और जीव को सुविधा प्रदान की कि वह मन के द्वारा नाना प्रकार के विचारों तथा आयोजनों की कल्पना करे। जन्म- मरण के चक्र की सृष्टि भगवान् ने की किन्तु प्रगति की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार आगे बढऩे के लिए मोहग्रस्त जीव को निर्देशित करने के लिए वेदों (छन्दोमयम् ) में अनेक आदेश दिये गये हैं। यदि कोई स्वर्ग जाना चाहता है, तो उसे वैदिक आदेशों का पालन करना चाहिए। जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता (९.२५) में कहा है—
यान्ति देवव्रता देवान् पितृन् यान्ति पितृव्रता:।

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥

“जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के बीच जन्म लेते हैं, जो भूतप्रेतों की पूजा करते हैं, वे इन्हीं के बीच जन्म ग्रहण करते हैं, जो पूर्वजों की पूजा करते हैं, वे उन्हीं के पास जाते हैं और जो मेरी पूजा करते हैं, वे मेरे साथ रहते हैं।” वेदों का असली अभिप्राय जीव को भगवद्धाम वापस जाने का मार्गनिर्देश करना है, किन्तु जीव अपने जीवन के असली लक्ष्य को न जानने के कारण कभी यहाँ जाना चाहता है, तो कभी वहाँ और कभी यह करना चाहता है, तो कभी वह। इस प्रकार वह विभिन्न योनियों में बन्दी बन कर सारे ब्रह्माण्ड में घूमता रहता है और ऐसे कार्यों में प्रवृत्त होता है, जिसके फल उसे भोगने पड़ते हैं। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं (चै.च. मध्य. १९.१५१)—

ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान जीव।

गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज।

पतित जीवात्मा माया में फँस कर भौतिक जगत में इधर-उधर भ्रमण करता रहता है किन्तु यदि भाग्यवश उसे भगवान् का प्रामाणिक प्रतिनिधि मिल जाता है, जो उसे भक्ति का बीज प्रदान करता है और यदि वह ऐसे गुरु या ईश्वर के प्रतिनिधि का लाभ उठाता है, तो उसे भक्ति-लता-बीज अर्थात् भक्ति का बीज प्राप्त होता है। यदि वह उचित रीति से कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करता है, तो वह धीरे धीरे आध्यात्मिक जगत तक उठा दिया जाता है। इससे चरम निष्कर्ष यह निकलता है कि मनुष्य को भक्तियोग के सिद्धान्तों की शरण ग्रहण करनी चाहिए, क्योंकि इससे उसे क्रमश: मुक्ति प्राप्त होगी। इस भौतिक संघर्ष से मुक्ति की कोई भी अन्य विधि सम्भव नहीं है।

* मन सदैव योजना बनाता है कि किस तरह भौतिक जगत में रहा जाये और जीवन-संघर्ष होता रहे। यह सूक्ष्म शरीर का मुख्य अंग है। जिस शरीर में मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार रहते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥