श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 28

 
श्लोक
एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे
कामाभिकाममनु य: प्रपतन्प्रसङ्गात् ।
कृत्वात्मसात् सुरर्षिणा भगवन्गृहीत:
सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस तरह; जनम्—सामान्य व्यक्ति को; निपतितम्—गिरा हुआ; प्रभव—भौतिक जगत के; अहि-कूपे—सर्पों से पूर्ण अंधे कुएँ में; काम-अभिकामम्—इन्द्रियविषयों की कामना; अनु—अनुसरण करते हुए; य:—जो व्यक्ति; प्रपतन्—(इस अवस्था में) गिर कर; प्रसङ्गात्—बुरी संगति के कारण या भौतिक इच्छाओं की अधिकाधिक संगति से; कृत्वा आत्मसात्— मुझको (अपने [नारद] जैसे आध्यात्मिक गुण प्राप्त करने के लिए) वाध्य करके; सुर-ऋषिणा—महान् सन्त पुरुष (नारद) द्वारा; भगवन्—हे भगवान्; गृहीत:—स्वीकार; स:—वह व्यक्ति; अहम्—मैं; कथम्—कैसे; नु—निस्सन्देह; विसृजे—त्याग सकता हूँ; तव—तुम्हारी; भृत्य-सेवाम्—शुद्ध भक्त की सेवा ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, मैं एक-एक करके भौतिक इच्छाओं की संगति में आने से सामान्य लोगों का अनुगमन करते हुए सर्पों के अन्धे कुएँ में गिरता जा रहा था। किन्तु आपके दास नारद मुनि ने कृपा करके मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया और मुझे यह शिक्षा दी कि इस दिव्य पद को किस तरह प्राप्त किया जाये। अतएव मेरा पहला कर्तव्य है कि मैं उनकी सेवा करूँ। भला मैं उनकी यह सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ?
 
तात्पर्य
 जैसाकि बाद के श्लोकों से पता चलेगा, यद्यपि भगवान् ने प्रह्लाद महाराज को सीधे मनवांछित वर माँगने के लिए कहा, किन्तु उन्होंने भगवान् की इस भेंट को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने उलट कर भगवान् से यह प्रार्थना की कि वे अपने दास नारद मुनि की सेवा में उसे लगा रहने दें। यह शुद्ध भक्त का लक्षण है। मनुष्य को चाहिए कि पहले गुरु की सेवा करे। ऐसा नहीं होता कि कोई अपने गुरु को छोडक़र भगवान् की सेवा करने की इच्छा करे। वैष्णव के लिए यह सिद्धान्त नहीं है। नरोत्तमदास ठाकुर कहते हैं—
तांदेर चरण सेवि भक्त-सने वास।

जनमे जनमे हय, एइ अभिलाष ॥

मनुष्य को सीधे भगवान् की सेवा करने के लिए उत्सुक नहीं होना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उपदेश दिया है कि मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् के दास का दासानुदास बने (गोपीभर्तु: पदकमलयोर्दासदासानुदास:)। भगवान् तक पहुँचने की यही विधि है। पहले गुरु की सेवा की जानी चाहिए जिससे उनकी कृपा से भगवान् की सेवा के निकट जाया जा सके। रूप गोस्वामी को शिक्षा देते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा था—गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज—गुरु की कृपा से और फिर कृष्ण की कृपा से भक्ति का बीज प्राप्त किया जा सकता है। सफलता का यही रहस्य है। पहले गुरु को प्रसन्न करने का प्रयत्न करना चाहिए और तब भगवान् को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भी कहते हैं—यस्य प्रसादाद् भगवत्प्रसादो। मनुष्य को मनगढ़त ज्ञान द्वारा भगवान् को प्रसन्न करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। पहले उसे गुरु की सेवा करने के लिए तैयार होना होता है और जब वह योग्य बन जाता है, तो उसे भगवान् की प्रत्यक्ष सेवा करने का स्वत: अवसर प्राप्त कराया जाता है। अतएव प्रह्लाद महाराज ने प्रस्ताव रखा कि उन्हें नारद मुनि की सेवा में लगे रहने दिया जाये। यही सही निष्कर्ष है। अतएव उन्होंने कहा—सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम्—भला मैं अपने उन गुरु की सेवा करना कैसे त्याग दूँ जिन्होंने मुझ पर इस तरह से कृपा की कि मैं अब आपको अपने समक्ष देख रहा हूँ? प्रह्लाद महाराज ने भगवान् से प्रार्थना की कि वे अपने गुरु नारद मुनि की सेवा में लगे रहें।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥