श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 34

 
श्लोक
तत्सम्भव: कविरतोऽन्यदपश्यमान-
स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्त्य ।
नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो
जातेऽङ्कुरे कथमुहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-सम्भव:—उस कमल से उत्पन्न; कवि:—सृष्टि के सूक्ष्म कारण को समझने वाला (ब्रह्मा); अत:—उस (कमल) से; अन्यत्—अन्य कुछ; अपश्यमान:—देख सकने में अक्षम; त्वाम्—आपको; बीजम्—कमल के कारण को; आत्मनि—अपने में; ततम्—विस्तार कर लिया; स:—उसने (ब्रह्मा); बहि: विचिन्त्य—अपने को बाहरी मानकर; न—नहीं; अविन्दत्— (आपको) समझा; अब्द-शतम्—देवताओं के अनुसार एक सौ वर्षों तक (देवताओं का एक दिन हमारे छ: मास के तुल्य); अप्सु—जल के भीतर; निमज्जमान:—गोता लगाकर; जाते अङ्कुरे—जब बीज अंकुरित होकर लता रूप में प्रकट होता है; कथम्—कैसे; उह—हे भगवान्; उपलभेत—कोई देख सकता है; बीजम्—पहले से फलित बीज को ।.
 
अनुवाद
 
 उस विशाल कमल पुष्प से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए किन्तु उन्हें उस कमल के सिवाय कुछ भी नहीं दिखा। अतएव आप को बाहर स्थित जानकर उन्होंने जल में गोता लगाया और वे एक सौ वर्षों तक उस कमल के उद्गम को खोजने का प्रयत्न करते रहे। किन्तु उन्हें आपका कोई पता नहीं चल पाया क्योंकि जब बीज फलीभूत होता है, तो असली बीज नहीं दिख पाता।
 
तात्पर्य
 यह विराट जगत का वर्णन है। इस जगत का विकास बीज के फलीभूत होने के समान है। जब रुई से धागे बन जाते हैं, तो रुई नहीं दिखती और जब धागों से कपड़ा बुना जाता है, तो धागे नहीं दिखते। इसी प्रकार यह कथन बिल्कुल सही है कि जब गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से उत्पन्न बीज विराट विश्व के रूप में प्रकट हो गया तो कोई यह नहीं समझ सकता था कि इस विराट विश्व की उत्पत्ति का कारण क्या था। आधुनिक विज्ञानियों ने सृष्टि के उद्गम की विवेचना
“पिंड सिद्धान्त” (चंक थ्योरी) से करने का प्रयास किया है, लेकिन यह कोई नहीं बता सकता कि ऐसा पिंड किस प्रकार फटा होगा। किन्तु वैदिक वाङ्मय स्पष्ट बताता है कि सम्पूर्ण भौतिक शक्ति परमेश्वर की चितवन से प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा क्षुब्ध हुई। दूसरे शब्दों में, “पिंड सिद्धान्त” के अनुसार पिंड का फटना भगवान् द्वारा किया गया। अतएव मनुष्य को चाहिए कि परम कारण विष्णु को समस्त कारणों का कारण स्वीकार कर ले।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥