श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 37

 
श्लोक
तस्मै भवान्हयशिरस्तनुवं हि बिभ्रद्
वेदद्रुहावतिबलौ मधुकैटभाख्यौ ।
हत्वानयच्छ्रुतिगणांश्च रजस्तमश्च
सत्त्वं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—उन ब्रह्मा को; भवान्—आप; हय-शिर:—घोड़े का शिर तथा गर्दन वाले; तनुवम्—अवतार; हि—निस्सन्देह; बिभ्रत्— स्वीकार करते हुए; वेद-द्रुहौ—दो असुर जो वैदिक सिद्धान्तों के विरुद्ध थे; अति-बलौ—अत्यन्त बलशाली; मधु-कैटभ- आख्यौ—मधु तथा कैटभ नाम से विख्यात; हत्वा—मारकर; अनयत्—प्रदान किया; श्रुति-गणान्—सारे भिन्न-भिन्न वेद (साम, यजु:, ऋग तथा अथर्व); च—तथा; रज: तम: च—रजो तथा तमो गुणों द्वारा अंकित करके; सत्त्वम्—शुद्ध दिव्य सतोगुण; तव—तुम्हारा; प्रिय-तमाम्—सर्वाधिक प्रिय; तनुम्—रूप का (हयग्रीव); आमनन्ति—आदर करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, जब आप घोड़े का शिर धारण करके हयग्रीव रूप में प्रकट हुए तो आपने रजो तथा तमो गुणों से पूर्ण मधु तथा कैटभ नामक दो असुरों का संहार किया। फिर आपने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान प्रदान किया। इसी कारण से सारे महान् ऋषिगण आपके रूपों को दिव्य अर्थात् भौतिक गुणों से अछूता मानते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपने दिव्य रूप में अपने भक्तों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सदा उद्यत रहते हैं। जैसाकि इस श्लोक में उल्लेख है भगवान् ने हयग्रीव रूप धारण करके मधु तथा कैटभ नामक असुरों का वध किया, जब उन्होंने ब्रह्माजी पर आक्रमण किया था। आधुनिक असुर यह सोचते हैं कि सृष्टि के प्रारम्भ में जीवन नहीं था, किन्तु श्रीमद्भागवत से हमें ज्ञात होता है कि भगवान् ने जिस प्रथम सजीव प्राणी को जन्म दिया वह ब्रह्मा था, जो वैदिक ज्ञान से ओत-प्रोत है। दुर्भाग्यवश जिन्हें वैदिक ज्ञान वितरित करने का भार सौंपा गया है, यथा कृष्णभावनामृत का प्रचार करने वाले भक्त, उन पर कभी-कभी असुरों द्वारा आक्रमण किये जा सकते हैं, किन्तु भक्तों को आश्वस्त रहना चाहिए कि ऐसे आसुरी आक्रमण से उनका बाल बाँका भी नहीं होगा, क्योंकि भगवान् उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए सदैव उद्यत रहते हैं। वेद वह ज्ञान प्रदान करते हैं जिसके द्वारा हम भगवान् को समझ सकते हैं (वेदैश्च सर्वैरहमेव वैद्य:)। भगवान् के भक्त उस ज्ञान का प्रसार करने के लिए सदैव उद्यत रहते हैं जिससे कृष्णभावनामृत द्वारा भगवान् को समझा जा सकता है। लेकिन असुरगण परमेश्वर को न समझ सकने के कारण रजो तथा तमो गुणों से पूर्ण रहते हैं। इस प्रकार दिव्य रूप वाले भगवान् असुरों का वध करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। सतोगुण के अनुशीलन से ही मनुष्य दिव्य भगवान् की स्थिति को तथा उन्हें समझने के मार्ग में आने वाले समस्त अवरोधों को हटाने के लिए वे जिस प्रकार सदैव उद्यत रहते हैं समझ सकता है।
सारांश रूप में जब भी भगवान् अवतरित होते हैं, वे अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होते हैं। जैसाकि भगवद्गीता (४.७) में भगवान् कहते हैं : यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

“हे भरतवंशी! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का प्राधान्य हो जाता है उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।” भगवान् के विषय में यह सोचना मूर्खता होगी कि वे मूलत: निर्विशेष हैं और जब वे साक्षात् रूप में अवतरित होते हैं, तो भौतिक शरीर धारण कर लेते हैं। भगवान् जब भी अवतरित होते हैं, वे अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होते हैं, जो आध्यात्मिक एवं आनन्दपूर्ण होता है। लेकिन मायावादी जैसे अज्ञानी लोग भगवान् के दिव्य रूप को नहीं समझ पाते अतएव भगवान् यह कहकर उनको दण्डित करते हैं—अवजानन्ति मां मूढा: मानुषीं तनुमाश्रितम्—जब मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। जब भी भगवान् प्रकट होते हैं, चाहे मछली के रूप में हों, कछुआ, शूकर या अन्य किसी रूप में हों, मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वे अपनी दिव्य स्थिति बनाये रखते हैं और उनका एकमात्र कार्य होता है हत्वा—असुरों का वध करना। भगवान् भक्तों की रक्षा करने तथा असुरों का वध करने के लिए प्रकट होते हैं (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् )। चूँकि असुरगण सदैव वैदिक सभ्यता का विरोध करने के लिए सन्नद्ध रहते हैं, अतएव भगवान् के दिव्य रूप के द्वारा उनका वध अवश्यम्भावी है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥