श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 43

 
श्लोक
नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्या-
स्त्वद्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्त: ।
शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ
मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; एव—निश्चय ही; उद्विजे—मैं उद्विग्न अथवा भयभीत हूँ; पर—हे पर; दुरत्यय—पार करना कठिन; वैतरण्या:— वैतरणी नदी को (भौतिक जगत की नदी); त्वत्-वीर्य—आपके यश तथा कार्यकलाप का; गायन—कीर्तन करने से या वितरित करने से; महा-अमृत—अमृत के समान आध्यात्मिक आनन्द के महासागर में; मग्न-चित्त:—लीन चित्त वाला; शोचे— मैं केवल पछता रहा हूँ; तत:—उससे; विमुख-चेतस:—वे मूर्ख तथा धूर्त जो कृष्णभावनामृत से विहीन हैं; इन्द्रिय-अर्थ—इन्द्रिय तृप्ति में; माया-सुखाय—क्षणिक मोहमय सुख के लिए; भरम्—मिथ्या भार या उत्तरदायित्व (अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र के पालन के लिए तथा उस हेतु विशद प्रबन्ध); उद्वहत:—उठाये हुए (इस प्रबन्ध के लिए महान् योजनाएं बना कर); विमूढान्—यद्यपि वे मूर्खों तथा धूर्तों के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं (मैं उनके विषय में भी सोच रहा हूँ) ।.
 
अनुवाद
 
 हे श्रेष्ठ महापुरुष, मैं भौतिक जगत से तनिक भी भयभीत नहीं हूँ, क्योंकि मैं जहाँ कहीं भी ठहरता हूँ आपके यश तथा कार्यकलाप के विचारों में लीन रहता हूँ। मैं एकमात्र उन मूर्खों तथा धूर्तों के लिए चिन्तित हूँ जो भौतिक सुख के लिए तथा अपने परिवार, समाज तथा देश के पालन हेतु बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं। मैं मात्र उन के प्रति प्रेम के बारे में चिन्तित हूँ।
 
तात्पर्य
 संसार भर में सारे व्यक्ति भौतिक जगत के दुखों से निपटने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं। यह बात वर्तमान समय के लिए, भूतकाल के लिए तथा भविष्य के लिए सत्य है। यद्यपि लोग इतनी बड़ी-बड़ी राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक योजनाएँ बनाते हैं, तो भी यहाँ पर उन्हें विमूढ अर्थात् मूर्ख कहा गया है। भगवद्गीता में इस भौतिक जगत को दु:खालयम् अशाश्वतम्—कहा गया है लेकिन ये मूर्ख भौतिक जगत को सुखालयम्—सुख का आगार बनाने पर तुले हैं। वे यह नहीं जानते कि प्रत्येक वस्तु भौतिक प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार किस प्रकार कार्य करती है और प्रकृति अपने ढंग से कार्य करती है—
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहङ्कार विमूढात्मा कर्ताहम् इति मन्यते ॥

“मोहग्रस्त जीवात्मा प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में अपने आपको उन सारे कार्यों का कर्ता मान लेता है, जो वास्तव में प्रकृति द्वारा सम्पन्न होते हैं।” (भगवद्गीता ३.२७) भौतिक प्रकृति जो मानव रूप में दुर्गा नाम से जानी जाती है, असुरों को दण्डित करने के लिए योजना बनाती है। यद्यपि सारे असुर, जो ईशविहीन दैत्य हैं, जीवन-संघर्ष में रत रहते हैं, किन्तु दुर्गा देवी, जो अपने दसों-हाथों में विभिन्न आयुधों से युक्त रहती हैं, उन पर सीधा प्रहार करती हैं। वे अपने सिंहवाहन या रजो तथा तमोगुण पर सवारी करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति रजो तथा तमों गुणों द्वारा युद्ध करने और प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का घोर संघर्ष करता है, किन्तु अन्ततोगत्वा प्रकृति के नियमों द्वारा सबों का विनाश हो जाता है।

भौतिक तथा आध्यात्मिक लोकों के बीच में वैतरणी नामक एक नदी पड़ती है। इसके दूसरी ओर अर्थात् आध्यात्मिक जगत में पहुँचने के लिए इस नदी को पार करना होता है। इसे पार करना दुष्कर है जैसाकि भगवद्गीता (७.१४) में भगवान् कहते हैं—दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया—मेरी इस दैवी शक्ति को जो तीन गुणों वाली है, पार पाना कठिन है। यहाँ पर यही दुरत्यया शब्द प्रयुक्त है, जिसका अर्थ है “अत्यन्त कठिन”। अतएव कोई भगवान् की दया के बिना प्रकृति के कठोर नियमों से पार नहीं पा सकता। इतने पर भी सारे भौतिकतावादी अपनी-अपनी योजनाओं से मोहग्रस्त कर भी इस भौतिक जगत में सुखी बनने के लिए बारम्बार प्रयास करते हैं, इसलिए उन्हें विमूढ—प्रथम कोटि का मूर्ख—कहा गया है। जहाँ तक प्रह्लाद महाराज की बात है, वे तनिक भी दुखी नहीं थे, क्योंकि इस भौतिक जगत में रहते हुए भी वे कृष्णभावनामृत से परिपूर्ण थे। जो लोग कृष्णभावनाभावित हैं और भगवान् की सेवा करने का प्रयास कर रहे हैं, वे दुखी नहीं हैं। किन्तु जिसके पास कृष्णभावनामृत की कोई पूँजी नहीं है और जो जीवन-संघर्ष में रत है, वह न केवल मूर्ख है, अपितु अत्यधिक दुखी भी है। प्रह्लाद महाराज एक साथ सुखी तथा दुखी थे। कृष्णभावनाभावित होने के कारण वे अत्यन्त सुख तथा दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे थे, फिर भी वे उन मूर्खों तथा धूर्तों के लिए अत्यधिक दुखी थे, जो इस भौतिक जगत में सुखी बनने की विशद योजनाएँ बनाते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥