श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 46

 
श्लोक
मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययनस्वधर्म-
व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्या: ।
प्राय: परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां
वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
मौन—चुप्पी; व्रत—व्रत; श्रुत—वैदिक ज्ञान; तप:—तपस्या; अध्ययन—शास्त्र का अध्ययन; स्व-धर्म—वर्णाश्रम धर्म का पालन; व्याख्या—शास्त्रों की विवेचना; रह:—एकान्त स्थान में रहना; जप—कीर्तन अथवा मंत्रों का उच्चारण; समाधय:— समाधि में रहना; आपवर्ग्या:—मोक्ष मार्ग में प्रगति करने के लिए किये जाने वाले दस प्रकार के कार्य; प्राय:—सामान्यतया; परम्—एकमात्र साधन; पुरुष—हे प्रभु; ते—वे सब; तु—लेकिन; अजित-इन्द्रियाणाम्—उन व्यक्तियों का जो इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकते; वार्ता:—जीविका; भवन्ति—हैं; उत—इसलिए ऐसा कहा जाता है; न—नहीं; वा—अथवा; अत्र—इस सम्बन्ध में; तु—लेकिन; दाम्भिकानाम्—मिथ्या गर्व करने वाले व्यक्तियों का ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, मोक्ष मार्ग के लिए दस विधियाँ संस्तुत हैं—मौन रहना, किसीसे बातें न करना, व्रत रखना, सभी प्रकार का वैदिक ज्ञान संचित करना, तपस्या करना, वेदाध्ययन करना, वर्णाश्रम धर्म के कर्तव्यों को पूरा करना, शास्त्रों की व्याख्या करना, एकान्त स्थान में रहना, मौन मंत्रोच्चार करना, समाधि में लीन रहना। मोक्ष की ये विभिन्न विधियाँ सामान्यतया उन लोगों के लिए व्यापारिक अभ्यास और जीविकोपार्जन के साधन हैं जिन्होंने इन्द्रियों को जीता नहीं। चूँकि ऐसे लोग मिथ्या अहंकारी होते हैं अतएव हो सकता है कि ये विधियाँ सफल न भी हों।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्रीमद्भागवत (६.१.१५) में कहा गया है—
केचित् केवलया भक्त्या वासुदेवपरायणा:।

अघं धुन्वन्ति कार्त्स्न्येन नीहारमिव भास्कर: ॥

“केवल ऐसा विरला पुरुष जिसने कृष्ण की पूर्ण अनन्य भक्ति स्वीकार की है, पापकर्मों के खर पतवार का उन्मूलन कर सकता है, जिससे उसके दोबारा उगने की सम्भावना न रहे। वह इसे केवल भक्ति के द्वारा कर सकता है, जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से कुहरे को तुरंत भगा देता है।” मनुष्य जीवन का असली प्रयोजन भव-बन्धन से मुक्ति प्राप्त करना है। ऐसी मुक्ति कई विधियों से प्राप्त की जा सकती है (तपसा ब्रह्मचर्येण शमेन च दमेन च ) किन्तु वे सब न्यूनाधिक तपस्या पर ही आश्रित रहती हैं, जो ब्रह्मचर्य से प्रारम्भ होती है। शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि जो वासुदेवपरायण हैं अर्थात् जो वासुदेव कृष्ण के चरणकमलों में पूर्णतया समर्पित हैं, वे मौन, व्रत तथा अन्य विधियों का फल केवल भक्ति करके स्वत: प्राप्त कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में, ये सारी विधियाँ उतनी शक्तिशाली नहीं हैं। यदि कोई भक्ति करता है, तो वे सब की सब सरलता से सम्पन्न हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, मौन का अर्थ केवल बोलना छोड़ देना नहीं है। जीभ तो बोलने के लिए है यद्यपि कभी-कभी दिखावे के लिए मनुष्य मौन रहता है। बहुत से ऐसे लोग हैं, जो सप्ताह में किसी एक दिन मौन रहते हैं। लेकिन वैष्णव ऐसा मौन धारण नहीं करता। मौन का अर्थ है मूर्खतापूर्ण भाषण न करना। सामान्यतया सभाओं, समारोहों तथा बैठकों में लोग मेढकों की तरह मूर्खतापूर्वक भाषण करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने इसे वाचो वेगम् कहा है। जो व्यक्ति कुछ कहना चाहता है, वह अपने को बड़ा भारी वक्ता दिखला सकता है किन्तु अच्छा यही है कि बोलने की अपेक्षा वह मौन रहे। अतएव मौन की यह विधि ऐसे व्यक्तियों के लिए संस्तुत है, जो व्यर्थ बोलने के आदी हैं। जो भक्त नहीं होता वह मूर्खतापूर्ण ही बोलेगा, क्योंकि उसमें कृष्ण की महिमा के विषय में बोलने की शक्ति नहीं होती। इस तरह वह जो कुछ भी बोलता है, वह माया द्वारा प्रभावित रहता है और उसकी तुलना मेढक के टरटराने से की गई है। किन्तु जो भगवान् की महिमा के विषय में बोलता है उसे मौन रहने की आवश्यकता नहीं है। श्री चैतन्य महाप्रभु की संस्तुति है कीर्तनीय: सदा हरि:—मनुष्य को चौबीसों घण्टे भगवान् की महिमा का कीर्तन करते रहना चाहिए। मौन रहने की कोई आवश्यकता नहीं है।

मोक्ष या मोक्ष के मार्ग पर प्रगति करने या मोक्ष के लिए ये दस विधियाँ भक्तों के लिए नहीं हैं। केवलया भक्त्या—यदि कोई केवल भगवद्भक्ति करता है, तो मोक्ष की सारी की सारी दसों विधियाँ स्वत: सम्पन्न हो जाती हैं। प्रह्लाद महाराज का प्रस्ताव है कि ऐसी विधियाँ अजितेन्द्रियों के लिए हैं, अर्थात् उनके लिए हैं, जो अपनी इन्द्रियों को जीत नहीं सकते। किन्तु भक्तगण पहले से अपनी इन्द्रियाँ जीत चुके होते हैं। सर्वोपाधि विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्—भक्त पहले से भौतिक कल्मष से मुक्त हुआ होता है। अतएव श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने कहा है—

दुष्ट मन! तुमि किसेर वैष्णव? प्रतिष्ठार तरे, निर्जनेर घरे, तव हरिनाम केवल कैतव।

ऐसे अनेक लोग हैं, जो हरे कृष्ण मंत्र का जाप एकान्त स्थान में करना चाहते हैं, लेकिन यदि कोई उपदेश करने, अभक्तों से निरन्तर बातें करने में रुचि नहीं रखता तो प्रकृति के गुणों के प्रभाव को पर विजय पाना दुष्कर है। अतएव जब तक कोई कृष्णभावनामृत में पूरी तरह प्रगत न हो उसे हरिदास ठाकुर की नकल नहीं करनी चाहिए, जिनके पास चौबीसों घण्टे पवित्र नाम का कीर्तन करने के अलावा कोई कार्य नहीं था। प्रह्लाद महाराज ऐसी विधि का तिरस्कार नहीं करते, वे इसे स्वीकार करते हैं किन्तु भगवान् की सक्रिय सेवा से इन विधियों में से किसी एक से सामान्यतया मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता। कोई मिथ्या अहंकार से ही मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥