श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 49

 
श्लोक
नैते गुणा न गुणिनो महदादयो ये
सर्वे मन: प्रभृतय: सहदेवमर्त्या: ।
आद्यन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा-
मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात् ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
न—न तो; एते—ये सब; गुणा:—प्रकृति के तीन गुण; न—न तो; गुणिन:—तीन गुणों के अधिष्ठाता देव (यथा ब्रह्मा रजोगुण के प्रधान देव हैं तथा शिव तमोगुण के); महत्-आदय:—पाँच तत्त्व, इन्द्रियाँ तथा तन्मात्राएँ; ये—जो; सर्वे—सभी; मन:— मन; प्रभृतय:—इत्यादि; सह-देव-मर्त्या:—देवताओं तथा मर्त्य मनुष्यों सहित; आदि-अन्त-वन्त:—जिनका आदि तथा अन्त है; उरुगाय—सभी साधु पुरुषों द्वारा महिमा-मण्डित होने वाले हे परमेश्वर; विदन्ति—समझतेहैं; हि—निस्सन्देह; त्वाम्—तुमको; एवम्—इस प्रकार; विमृश्य—विचार करके; सुधिय:—सारे बुद्धिमान पुरुष; विरमन्ति—रुक जाते हैं; शब्दात्—वेदों का अध्ययन करने या समझने से ।.
 
अनुवाद
 
 न तो प्रकृति के तीन गुण (सतो, रजो तथा तमो), न इन तीनों गुणों के नियामक अधिष्ठाता देव, न पाँच स्थूल तत्त्व, न मन, न देवता, न मनुष्य ही आपको समझ सकते हैं, क्योंकि ये सभी जन्म तथा संहार के वशीभूत रहते हैं। ऐसा विचार करके आध्यात्मिक दृष्टि से प्रगत व्यक्ति भक्ति करने लगे हैं। ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति वैदिक अध्ययन की परवाह नहीं करते, निस्सन्देह वे व्यावहारिक भक्ति में अपने आपको लगाते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसा कई स्थानों पर कहा गया है—भक्त्या मामभिजानाति—केवल भक्ति द्वारा परमेश्वर को जाना जा सकता है। बुद्धिमान मनुष्य अर्थात् भक्त श्लोक ४६ में वर्णित विधियों के विषयों में अधिक माथापच्ची नहीं करते (मौनव्रतश्रुततपोऽध्ययन-स्वधर्म )। भक्ति द्वारा भगवान् को समझ लेने के बाद ऐसे भक्त वेदाध्ययन में रुचि नहीं दिखाते। निस्सन्देह, इसकी पुष्टि वेदों में भी हुई है। वेदों का कथन है किम् अर्था वयम् अध्येष्यामहे किम् अर्था वयम् वक्ष्यामहे। इतने वेदों का अध्ययन करने से क्या लाभ? उनकी तरह-तरह से व्याख्या करने से क्या लाभ? वयम् वक्ष्यामहे। किसी को न तो वेदाध्ययन की आवश्यकता रह जाती है, न दार्शनिक चिन्तन द्वारा उनका वर्णन करने की। भगवद्गीता (२.५२) का भी कहना है—
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

जब कोई भक्ति द्वारा भगवान् को जान लेता है, तो वह वेदाध्ययन बन्द कर देता है। अन्यत्र भी कहा गया है—आराधितो यदि हरिस्तपसा तत: किम्। यदि कोई भगवान् को समझ सकता है और उनकी सेवा में लग जाता है, तो कठिन तपस्या करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है। किन्तु यदि कोई कठिन तपस्या करके भगवान् को नहीं समझ पाता तो ऐसी तपस्या व्यर्थ है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥