श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 5

 
श्लोक
स्वपादमूले पतितं तमर्भकं
विलोक्य देव: कृपया परिप्लुत: ।
उत्थाप्य तच्छीर्ष्ण्यदधात्कराम्बुजं
कालाहिवित्रस्तधियां कृताभयम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-पाद-मूले—अपने चरणकमलों पर; पतितम्—गिरा हुआ; तम्—उस (प्रह्लाद महाराज); अर्भकम्—छोटे से बालक को; विलोक्य—देखकर; देव:—नृसिंहदेव ने; कृपया—अपनी अहैतुकी कृपा से; परिप्लुत:—भावविभोर होकर; उत्थाप्य—उठा कर; तत्-शीर्ष्णि—उसके सिर पर; अदधात्—रख दिया; कर-अम्बुजम्—अपना कर कमल; काल-अहि—काल रूपी सर्प का (जो तुरन्त ही मार सकता है); वित्रस्त—डरा हुआ; धियाम्—उन सबों के जिनके मन; कृत-अभयम्—निर्भय बनाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब नृसिंहेदव ने देखा कि छोटे से बालक प्रह्लाद महाराज ने चरमकमलों पर साष्टांग प्रणाम किया है, तो वे अपने भक्त के प्रति अत्यधिक भाव-विभोर हो उठे। प्रह्लाद को उठाते हुए उन्होंने अपना कर-कमल उस बालक के सिर पर रख दिया। उनका हाथ उनके समस्त भक्तों को अभय-दान करने वाला है।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत की चार आवश्यकताएँ हैं—आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन। इस भौतिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति सदैव भयभीत रहता है (सदा समुद्विग्न-धियाम् ) और प्रत्येक व्यक्ति को निर्भय बनाने का एकमात्र साधन है कृष्णभावनामृत। जब भगवान् नृसिंहदेव प्रकट
हुए तो सारे भक्त निर्भय हो गये। भक्त के निर्भय होने की आशा है भगवान् नृसिंहदेव के पवित्र नाम का कीर्तन करना। यतो यतो यामि ततो नृसिंह:—हम जहाँ-जहाँ भी जाँय, सदैव नृसिंह भगवान् का चिन्तन करें। इस तरह भगवद्भक्त को कोई भय नहीं रह जाएगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥