श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 54

 
श्लोक
प्रीणन्ति ह्यथ मां धीरा: सर्वभावेन साधव: ।
श्रेयस्कामा महाभाग सर्वासामाशिषां पतिम् ॥ ५४ ॥
 
शब्दार्थ
प्रीणन्ति—प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं; हि—निस्सन्देह; अथ—इसके कारण; माम्—मुझको; धीरा:—जो गम्भीर तथा बुद्धिमान हैं; सर्व-भावेन—सभी प्रकार से, भक्ति के विभिन्न भावों से; साधव:—सदाचारी पुरुष (सभी प्रकारसे पूर्ण); श्रेयस्- कामा:—जीवन में श्रेष्ठ लाभ की इच्छा करने वाले; महा-भाग—हे परम भाग्यशाली; सर्वासाम्—समस्त; आशिषाम्— आशीर्वादों के; पतिम्—स्वामी को (मुझको) ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रह्लाद, तुम अत्यन्त भाग्यशाली हो। तुम मुझसे यह जान लो कि जो अत्यन्त चतुर तथा ऊपर उठे हुए हैं, वे सभी विभिन्न भावों द्वारा मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि मैं ही ऐसा व्यक्ति हूँ जो हर एक की सारी इच्छाओं को पूरा कर सकता हूँ।
 
तात्पर्य
 धीरा: सर्वभावेन शब्दों का अर्थ “तुम जिस तरह चाहो” नहीं है। भाव तो ईश-प्रेम की प्रारम्भिक दशा है—
अथासक्तिस्ततो भावस्तत: प्रेमाभ्युदञ्चति।

साधकानाम् अयं प्रेम्ण: प्रादुर्भावे भवेत् क्रम: ॥

(भक्तिरसामृतसिंधु १.४.१६) ईश-प्रेम तक पहुँचने के पूर्व भाव दशा अन्तिम विभाग है। सर्वभाव का अर्थ है कि मनुष्य भगवान् को कई दिव्य भावों से प्रेम कर सकता है—यथा दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य भाव। शान्त अवस्था में मनुष्य भगवान् की प्रेमाभक्ति की सीमारेखा पर होता है। ईश्वर का शुद्ध प्रेम दास्य भाव से प्रारम्भ होता है और सख्य, वात्सल्य में विकसित होता हुआ माधुर्य भाव को प्राप्त होता है। फिर भी इन पाँचों भावों में से किसी एक द्वारा भगवान् की प्रेमाभक्ति की जा सकती है। चूँकि हमारा मुख्य कार्य भगवान् से प्रेम करना है, अतएव मनुष्य उपर्युक्त प्रेम के किसी भी पद से सेवा कर सकता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥