श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 6

 
श्लोक
स तत्करस्पर्शधुताखिलाशुभ:
सपद्यभिव्यक्तपरात्मदर्शन: ।
तत्पादपद्मं हृदि निर्वृतो दधौ
हृष्यत्तनु: क्लिन्नहृदश्रुलोचन: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (प्रह्लाद महाराज); तत्-कर-स्पर्श—नृसिंहदेव के कर कमल द्वारा स्पर्श किये जाने पर; धुत—पवित्र होकर; अखिल—सम्पूर्ण; अशुभ:—अशुभ या भौतिक इच्छाएँ; सपदि—तुरन्त; अभिव्यक्त—प्रकट; पर-आत्म-दर्शन:—परमात्मा का साक्षात्कार; तत्-पाद-पद्मम्—नृसिंहदेव के चरणकमल को; हृदि—हृदय में; निर्वृत:—दिव्य आनन्द से पूरित; दधौ—बन्दी बना लिया; हृष्यत्-तनु:—शरीर में दिव्य आनन्द का प्रकट्य; क्लिन्न-हृत्—दिव्य आनन्द के कारण मृदु हुए हृदय वाला; अश्रु लोचन:—अपनी आँखों में आँसू भर कर ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् नृसिंहदेव द्वारा प्रह्लाद महाराज का सिर स्पर्श करने से प्रह्लाद के समस्त भौतिक कल्मष तथा इच्छाएँ पूर्णतया धुल गईं। अतएव वे दिव्य पद को प्राप्त हो गये और उनके शरीर में आनन्द के सारे लक्षण प्रकट हो गए। उनका हृदय प्रेम से पूरित हो उठा, उनकी आँखों में आँसू आ गये और उन्होंने अपने हृदय में भगवान् के चरणकमलों को बन्दी बना लिया।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (१४.२६) में कहा गया है—
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।

स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

“जो भक्ति में पूरी तरह लगा रहता है और किसी भी परिस्थिति में च्युत नहीं होता वह तुरन्त प्रकृति के गुणों को पार करके ब्रह्मपद को प्राप्त होता है।” भगवान् ने अन्यत्र भगवद्गीता (९.३२) में कहा है—

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

“हे पृथापुत्र! जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे चाहे निम्नतर जन्म के अर्थात् स्त्रियाँ, वैश्य तथा शूद्र क्यों न हों परम लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं।”

भगवद्गीता के इन श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि प्रह्लाद महाराज असुर-कुल में उत्पन्न हुए थे और उनकी रगो में आसुरी रक्त प्रवाहित हो रहा था, किन्तु भक्त के दिव्य पद के कारण उनके सारे भौतिक शारीरिक कल्मष धुल गये थे। दूसरे शब्दों में, अध्यात्म पथ के ऐसे अवरोध उन्हें प्रगति करने से नहीं रोक सके थे, क्योंकि वे भगवान् के प्रत्यक्ष सम्पर्क में थे। जो लोग तन तथा मन से नास्तिकता से दूषित हैं, वे कभी भी दिव्य पद पर स्थित नहीं हो सकते, किन्तु ज्योंही ऐसे लोग भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाते हैं त्योंही वे भक्ति के पद पर स्थित होने के योग्य हो जाते हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥