श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 7

 
श्लोक
अस्तौषीद्धरिमेकाग्रमनसा सुसमाहित: ।
प्रेमगद्गदया वाचा तन्न्यस्तहृदयेक्षण: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
अस्तौषीत्—वह प्रार्थना करने लगा; हरिम्—भगवान् की; एकाग्र-मनसा—भगवान् के चरणकमलों पर अपने मन को स्थिर करके; सु-समाहित:—अत्यन्त मनोयोग से; प्रेम-गद्गदया—दिव्य आनन्द की अनुभूति के कारण बोल सकने में असमर्थ; वाचा—वाणी से; तत्-न्यस्त—उन (नृसिंहदेव) पर पूर्णतया समर्पित; हृदय-ईक्षण:—हृदय तथा दृष्टि सहित ।.
 
अनुवाद
 
 प्रह्लाद महाराज ने पूर्ण समाधि में पूरे मनोयोग से अपने मन तथा दृष्टि को भगवान् नृसिंहदेव पर स्थिर कर दिया। तब वे स्थिर मन से अवरुद्ध वाणी से प्रेमपूर्वक प्रार्थना करने लगे।
 
तात्पर्य
 सुसमाहित: शब्द का अर्थ है “अत्यन्त ध्यानपूर्वक” या “पूर्णतया स्थिर होकर”। योगसिद्धि के फलस्वरूप ही इस प्रकार मन को स्थिर किया जा सकता है। श्रीमद्भागवत (१२.१३.१) में कहा गया है—ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिन:। मनुष्य को योगसिद्धि तभी मिल सकती है जब वह समस्त भौतिक विक्षेपों से मुक्त होता है और उसका
मन भगवान् के चरणकमलों में स्थिर हो जाता है। यह समाधि कहलाती है। प्रह्लाद महाराज ने यह अवस्था प्राप्त कर ली थी। चूँकि वे सेवा में लगे रहते थे, अतएव वे अपने को अध्यात्म पद पर स्थित अनुभव करते थे। उनका मन तथा ध्यान स्वभावत: अध्यात्म में लीन रहता था। उसी स्थिति में उन्होंने निम्न प्रकार से प्रार्थना करनी शुरू की।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥