श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 9: प्रह्लाद द्वारा नृसिंह देव का प्रार्थनाओं से शान्त किया जाना  »  श्लोक 8

 
श्लोक
श्रीप्रह्राद उवाच
ब्रह्मादय: सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धा:
सत्त्वैकतानगतयो वचसां प्रवाहै: ।
नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रु:
किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजाते: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-प्रह्राद: उवाच—प्रह्लाद महाराज ने प्रार्थना की; ब्रह्म-आदय:—ब्रह्माजी तथा अन्यों ने; सुर-गणा:—उच्च लोक के निवासी; मुनय:—परम साधु व्यक्ति; अथ—भी (यथा चारों कुमार इत्यादि); सिद्धा:—जिन्होंने सिद्धि या पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है; सत्त्व—आध्यात्मिक स्थिति के लिए; एकतान-गतय:—जिन्होंने बिना विचलन के किसी भी भौतिक कार्यकलाप को ग्रहण कर लिया है; वचसाम्—वृत्तान्तों या वचनों का; प्रवाहै:—धाराओं के द्वारा; न—नहीं; आराधितुम्—प्रसन्न करने के लिए; पुरु- गुणै:—यद्यपि पूर्णतया योग्य; अधुना—अब तक; अपि—भी; पिप्रु:—समर्थ थे; किम्—क्या; तोष्टुम्—प्रसन्न करने के लिए; अर्हति—समर्थ है; स:—वह (भगवान्); मे—मेरा; हरि:—भगवान्; उग्र-जाते:—असुर परिवार में जन्मा ।.
 
अनुवाद
 
 प्रह्लाद महाराज ने प्रार्थना की: असुर परिवार में जन्म लेने के कारण यह कैसे सम्भव हो सकता है कि मैं भगवान् को प्रसन्न करने के लिए उपयुक्त प्रार्थना कर सकूँ? आज तक ब्रह्मा इत्यादि सारे देवता तथा समस्त मुनिगण उत्तमोत्तम वाणी से भगवान् को प्रसन्न नहीं कर पाये, यद्यपि ये सारे व्यक्ति सतोगुणी एवं परम योग्य हैं, तो फिर मेरे विषय में क्या कहा जाये? मैं तो बिल्कुल ही अयोग्य हूँ।
 
तात्पर्य
 एक पूर्ण योग्य वैष्णव भगवान् की प्रार्थना करते समय अपने को अत्यन्त तुच्छ समझता है। उदाहरणार्थ, चैतन्य-चरितामृत के लेखक कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं— जगाइ माधाइ हैते मुञि से पापिष्ठ।
पुरीषेर कीट हैते मुञि से लघिष्ठ ॥

(चैतन्य-चरितामृत, आदि ५.२०५) इस तरह वह अपने को विष्ठा के कीड़े से भी तुच्छ तथा जगाइ एवं माधाइ से भी अधिक पापी मानता है। शुद्ध वैष्णव अपने विषय में ऐसा ही सोचता है। इसी तरह यद्यपि प्रह्लाद महाराज अत्यन्त शुद्ध उच्च वैष्णव थे किन्तु वे अपने को भगवान् की प्रार्थना के लिए परम अयोग्य समझ रहे थे। महाजनो येन गत: स पन्था:। प्रत्येक शुद्ध वैष्णव को इसी तरह सोचना चाहिए। उसे अपनी वैष्णव योग्यताओं का वृथा गर्व नहीं होना चाहिए। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने उपदेश दिया है— तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना।

अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि: ॥

“मनुष्य को चाहिए कि वह अपने को पगडंडी के तिनके से भी तुच्छ माने और विनीत भाव से भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करे। उसे वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु होना चाहिए, उसे मिथ्या प्रतिष्ठा-भाव से रहित होना चाहिए और सदैव अन्यों का आदर करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसी मनोदशा में ही वह भगवान् के पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन कर सकता है।” विनीत हुए बिना आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कर पाना अत्यन्त कठिन है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥