श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तांस्तथावसितान् वीक्ष्य यज्ञ: सर्वगतो हरि: ।
यामै: परिवृतो देवैर्हत्वाशासत् त्रिविष्टपम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तान्—असुरों तथा राक्षसों को; तथा—इस प्रकार; अवसितान्—जो स्वायंभुव मनु को निगलने के लिए कृतसंकल्प थे; वीक्ष्य—देखकर; यज्ञ:—भगवान् विष्णु, जो यज्ञ कहलाते हैं; सर्व-गत:—हर एक के हृदय में स्थित; हरि:—भगवान्; यामै:— याम नामक अपने पुत्रों के साथ; परिवृत:—घिरा हुआ; देवै:—देवताओं से; हत्वा—(असुरों को) मारकर; अशासत्—(इन्द्रपद ग्रहण करके) शासन चलाया; त्रि-विष्टपम्—स्वर्ग-लोकों का ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक हृदय में वास करने वाले भगवान् विष्णु यज्ञपति के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने देखा कि राक्षस तथा असुर स्वायंभुव मनु को निगल जाने वाले हैं। इस प्रकार याम नामक अपने पुत्रों तथा अन्य सभी देवताओं को साथ लेकर भगवान् ने उन असुरों तथा राक्षसों को मार डाला। तब उन्होंने इन्द्र का पद ग्रहण किया और स्वर्ग लोक पर शासन करने लगे।
 
तात्पर्य
 देवताओं के विभिन्न नाम यथा ब्रह्मा, शिव, इन्द्र इत्यादि व्यक्तिगत नाम नहीं हैं। वे विभिन्न पदों के नाम हैं। इस प्रसंग में हमें
पता लगता है कि इन पदों को ग्रहण करने योग्य उपयुक्त व्यक्तियों के न होने पर भगवान् विष्णु कभी ब्रह्मा बनते हैं, तो कभी इन्द्र।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥