श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 30

 
श्लोक
तत्रापि जज्ञे भगवान्हरिण्यां हरिमेधस: ।
हरिरित्याहृतो येन गजेन्द्रो मोचितो ग्रहात् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
तत्रापि—उस काल में; जज्ञे—प्रकट हुआ; भगवान्—भगवान्; हरिण्याम्—हरिणी के गर्भ में; हरिमेधस:—हरिमेधा से उत्पन्न; हरि:—हरि; इति—इस प्रकार; आहृत:—कहलाया; येन—जिसके द्वारा; गज-इन्द्र:—हाथियों का राजा; मोचित:—छुड़ाया गया था; ग्रहात्—घडिय़ाल के मुख से ।.
 
अनुवाद
 
 इस मन्वन्तर में भगवान् विष्णु ने भी हरिमेधा की पत्नी हरिणी के गर्भ से जन्म लिया और वे हरि कहलाये। हरि ने हाथियों के राजा एवं अपने भक्त गजेन्द्र को घडिय़ाल के मुख से छुड़ाया।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥