श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 4

 
श्लोक
श्रीऋषिरुवाच
मनवोऽस्मिन्व्यतीता: षट् कल्पे स्वायम्भुवादय: ।
आद्यस्ते कथितो यत्र देवादीनां च सम्भव: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-ऋषि: उवाच—महान् ऋषि शुकदेव गोस्वामी ने कहा; मनव:—मनु; अस्मिन्—इस अवधि (ब्रह्मा के एक दिन) में; व्यतीता:—बीता हुआ; षट्—छ:; कल्पे—ब्रह्मा के एक दिन में; स्वायम्भुव—स्वायंभुव मनु; आदय:—इत्यादि; आद्य:—प्रथम (स्वायंभुव); ते—तुमसे; कथित:—पहले कहा जा चुका; यत्र—जिसमें; देव-आदीनाम्—समस्त देवताओं का; च—भी; सम्भव:—प्राकट्य, जन्म ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वर्तमान कल्प में छह मनु हो चुके हैं। मैं तुमसे स्वायंभुव मनु तथा अनेक देवताओं के प्राकट्य के विषय में वर्णन कर चुका हूँ। ब्रह्मा के इस कल्प में स्वायंभुव प्रथम मनु हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥