श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 10: देवताओं तथा असुरों के बीच युद्ध  »  श्लोक 16-18

 
श्लोक
वैरोचनो बलि: सङ्ख्ये सोऽसुराणां चमूपति: ।
यानं वैहायसं नाम कामगं मयनिर्मितम् ॥ १६ ॥
सर्वसाङ्ग्रामिकोपेतं सर्वाश्चर्यमयं प्रभो ।
अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं द‍ृश्यमानमदर्शनम् ॥ १७ ॥
आस्थितस्तद् विमानाग्र्यं सर्वानीकाधिपैर्वृत: ।
बालव्यजनछत्राग्र्यै रेजे चन्द्र इवोदये ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
वैरोचन:—विरोचन का पुत्र; बलि:—महाराज बलि; सङ्ख्ये—युद्ध में; स:—वह, इतना विख्यात; असुराणाम्—असुरों का; चमू-पति:—सेनापति; यानम्—वायुयान; वैहायसम्—वैहायस; नाम—नामक; काम-गम्—इच्छानुसार कहीं भी उडऩे में समर्थ; मय-निर्मितम्—मय दानव द्वारा बनाया हुआ; सर्व—सारा; साङ्ग्रामिक-उपेतम्—सभी तरह के शत्रुओं से लडऩे के लिए सभी प्रकार के आवश्यक हथियारों से युक्त; सर्व-आश्चर्य-मयम्—सभी तरह से आश्चर्यपूर्ण; प्रभो—हे राजा; अप्रतर्क्यम्— वर्णन न किए जाने योग्य; अनिर्देश्यम्—अवर्णनीय; दृश्यमानम्—कभी-कभी दृश्य; अदर्शनम्—कभी-कभी अदृश्य; आस्थित:—इस तरह से आसीन; तत्—वह; विमान-अछयम्—सवोत्कृष्ट वायुयान; सर्व—सारा; अनीक-अधिपै:—सैनिकों के नायकों द्वारा; वृत:—घिरा; बाल-व्यजन-छत्र-अछयै:—सुन्दर ढंग से सजाये छातों एवं श्रेष्ठ चामरों से सुरक्षित; रेजे—चमकते हुए स्थित; चन्द्र:—चन्द्रमा; इव—सदृश; उदये—शाम को उदय होते समय ।.
 
अनुवाद
 
 उस युद्ध के लिए विख्यात सेनापति विरोचन-पुत्र महाराज बलि वैहायस नामक अद्भुत वायुयान पर आसीन थे। हे राजा! यह सुन्दर ढंग से सजाया गया वायुयान मय दानव द्वारा निर्मित किया गया था और युद्ध के सभी प्रकार के हथियारों से युक्त था। यह अचिन्त्य तथा अवर्णनीय था। यह कभी दिखता तो कभी नहीं दिखता था। इस वायुयान में एक सुन्दर छाते के नीचे बैठे तथा सर्वोत्तम चमरों से पंखा झले जाते हुए एवं अपने सेनानायकों से घिरे महाराज बलि इस प्रकार लग रहे थे मानों शाम को चन्द्रमा उदय हो रहा हो और सभी दिशाओं को प्रकाशित कर रहा हो।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥