श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 10

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इत्याक्षिप्य विभुं वीरो नाराचैर्वीरमर्दन: ।
आकर्णपूर्णैरहनदाक्षेपैराहतं पुन: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; आक्षिप्य—प्रताडि़त करके; विभुम्—इन्द्र को; वीर:— बहादुर बलि महाराज; नाराचै:—नाराच नामक बाणों से; वीर-मर्दन:—बड़े-बड़े वीरों को भी दमित करने वाले बलि महाराज; आकर्ण-पूर्णै:—कानों तक खींचकर; अहनत्—आक्रमण किया; आक्षेपै:—प्रताडऩा के शब्दों से; आह—कहा; तम्—उससे; पुन:—फिर ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : स्वर्ग के राजा इन्द्र को इस प्रकार कटु वचनों से फटकारने के बाद वीरों को मर्दन करने वाले बलि महाराज ने नाराच बाणों को अपने कान तक खींचा और उनसे इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने पुन: इन्द्र को कठोर शब्दों से प्रताडि़त किया।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥