श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 17

 
श्लोक
तस्य तत् पूजयन् कर्म यन्तुर्दानवसत्तम: ।
शूलेन ज्वलता तं तु स्मयमानोऽहनन्मृधे ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—मातलि की; तत्—वह सेवा (इन्द्र के समक्ष रथ को लाना); पूजयन्—प्रशंसा करते हुए; कर्म—स्वामी की ऐसी सेवा; यन्तु:—सारथी का; दानव-सत्-तम:—असुर श्रेष्ठ, जम्भासुर; शूलेन—त्रिशूल से; ज्वलता—अग्नि की लपटें निकालता; तम्—मातलि को; तु—निस्सन्देह; स्मयमान:—मुस्काते हुए; अहनत्—मारा; मृधे—युद्धस्थल में ।.
 
अनुवाद
 
 मातलि के सेवाभाव की प्रशंसा करते हुए असुरश्रेष्ठ जम्भासुर मुस्कराने लगा। फिर भी उसने युद्धभूमि में अग्नि के समान जलते हुए अपने त्रिशूल से मातलि पर प्रहार कर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥