श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 23

 
श्लोक
नमुचि: पञ्चदशभि: स्वर्णपुङ्खैर्महेषुभि: ।
आहत्य व्यनदत्सङ्ख्ये सतोय इव तोयद: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
नमुचि:—नमुचि नामक राक्षस ने; पञ्च-दशभि:—पन्द्रह; स्वर्ण-पुङ्खै:—सुनहले पंखों वाले; महा-इषुभि:—अत्यन्त शक्तिशाली बाणों से; आहत्य—भेदकर; व्यनदत्—गर्जना की; सङ्ख्ये—युद्धभूमि में; स-तोय:—जल से भरे हुए; इव—सदृश; तोय द:—वर्षा करने वाला बादल ।.
 
अनुवाद
 
 तब एक दूसरे असुर नमुचि ने इन्द्र पर आक्रमण किया और उसे पन्द्रह सुनहरे पंखों वाले अत्यन्त शक्तिशाली बाणों से घायल कर दिया जो जल से भरे बादल के समान गरज रहे थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥