श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 25

 
श्लोक
अलक्षयन्तस्तमतीव विह्वला
विचुक्रुशुर्देवगणा: सहानुगा: ।
अनायका: शत्रुबलेन निर्जिता
वणिक्पथा भिन्ननवो यथार्णवे ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
अलक्षयन्त:—देख सकने में असमर्थ; तम्—इन्द्र को; अतीव—अत्यधिक बुरी तरह से; विह्वला:—मोहग्रस्त; विचुक्रुशु:— पश्चाताप करने लगे; देव-गणा:—सारे देवता; सह-अनुगा:—अपने अनुयायियों सहित; अनायका:—बिना नेता के; शत्रु बलेन—अपने शत्रुओं की श्रेष्ठ शक्ति द्वारा; निर्जिता:—अत्यधिक सताये गये; वणिक्-पथा:—व्यापारी; भिन्न-नव:—जिसका जहाज टूट गया हो; यथा अर्णवे—जिस तरह समुद्र के बीच में ।.
 
अनुवाद
 
 देवतागण अपने शत्रुओं द्वारा बुरी तरह से सताये जाने तथा युद्धभूमि में इन्द्र को न देख पाने के कारण अत्यन्त चिन्तित थे। वे बिना नायक या कप्तान के उसी तरह विलाप करने लगे जिस तरह समुद्र के बीच में जहाज ध्वंस होने पर व्यापारी विलाप करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस कथन से प्रतीत होता है कि उच्चलोकों में जहाजरानी होती है और व्यापारी व्यवसाय के रूप में नौका चालन करते हैं। कभी-कभी इस लोक की तरह इन व्यापारियों का भी जहाज समुद्र के बीच में ध्वंस हो जाता है। ऐसा लगता है कि उच्चलोकों में भी ऐसी विपदाएँ कभी कभी
आती रहती हैं। भगवान् की सृष्टि में होने से उच्चलोक भी शून्य या जीवों से रहित नहीं है। श्रीमद्भागवत से हमें ज्ञात होता है कि हमारी पृथ्वी की भाँति प्रत्येक लोक जीवों से पूर्ण है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि अन्य लोकों में कोई जीव नहीं हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥