श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 26

 
श्लोक
ततस्तुराषाडिषुबद्धपञ्जराद्
विनिर्गत: साश्वरथध्वजाग्रणी: ।
बभौ दिश: खं पृथिवीं च रोचयन्
स्वतेजसा सूर्य इव क्षपात्यये ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; तुराषाट्—इन्द्र का दूसरा नाम; इषु-बद्ध-पञ्जरात्—शर पंजर से; विनिर्गत:—छूटकर; स—सहित; अश्व— घोड़े; रथ—रथ; ध्वज—झंडा; अग्रणी:—तथा सारथी; बभौ—हो गये; दिश:—सारी दिशाएँ; खम्—आकाश को; पृथिवीम्—पृथ्वी को; च—तथा; रोचयन्—सुहावना बनाते; स्व-तेजसा—अपने तेज से; सूर्य:—सूर्य; इव—सदृश; क्षपा- अत्यये—रात्रि बीत जाने पर ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् इन्द्र ने बाणों के पिंजर से अपने को छुड़ाया। वह अपने रथ, झंडे, घोड़े तथा सारथी के साथ प्रकट हुआ और आकाश, पृथ्वी तथा सभी दिशाओं में प्रसन्नता फैलाते हुए वह तेजी से ऐसे चमकने लगा मानो रात बीद जाने पर सूर्य तेजी से चमक रहा हो। इन्द्र सब की दृष्टि में तेजवान् तथा सुन्दर लग रहा था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥