श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 3

 
श्लोक
वज्रपाणिस्तमाहेदं तिरस्कृत्य पुर:स्थितम् ।
मनस्विनं सुसम्पन्नं विचरन्तं महामृधे ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
वज्र-पाणि:—हाथ में सदा वज्र रहता है, जिसके, इन्द्र; तम्—बलि महाराज को; आह—सम्बोधित किया; इदम्—इस तरह; तिरस्कृत्य—प्रताडि़त करके; पुर:-स्थितम्—उसके सामने खड़े होकर; मनस्विनम्—अत्यन्त गम्भीर तथा सहिष्णु; सु सम्पन्नम्—युद्ध के साज-सामान से युक्त; विचरन्तम्—घूमते हुए; महा-मृधे—विशाल युद्धस्थल में ।.
 
अनुवाद
 
 गम्भीर, सहिष्णु तथा लडऩे के साज-सामान से भलीभान्ति युक्त बलि महाराज उस विशाल युद्धस्थल में इन्द्र के सामने घूम रहे थे। सदा हाथ में वज्र लिये रहने वाले इन्द्र ने बलि महाराज को इस प्रकार तिरस्कारपूर्वक ललकारा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥