श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 40

 
श्लोक
न शुष्केण न चार्द्रेण जहार नमुचे: शिर: ।
तं तुष्टुवुर्मुनिगणा माल्यैश्चावाकिरन्विभुम् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
न—न तो; शुष्केण—शुष्क साधन से; न—न तो; च—भी; आर्द्रेण—गीले हथियार से; जहार—उसने काट लिया; नमुचे:— नमुचि का; शिर:—सिर; तम्—उसको (इन्द्र को); तुष्टुवु:—सन्तुष्ट किया; मुनि-गणा:—सारे मुनियों ने; माल्यै:—फूलों की मालाओं से; च—भी; अवाकिरन्—ढक दिया; विभुम्—उस महापुरुष को ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह स्वर्ग के राजा इन्द्र ने अपनी झाग के हथियार से नमुचि का सिर काट दिया। यह झाग न तो शुष्क थी, न आर्द्र। तब सारे मुनियों ने उस महापुरुष इन्द्र पर फूलों की वर्षा की तथा माल्यार्पण द्वारा उसे लगभग ढक दिया और सन्तुष्ट कर लिया।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में श्रुति-मन्त्रों का कहना है—अपां फेनेन नमुचे: शिर इन्द्रोऽदारयत्—इन्द्र
ने नमुचि को जल की झाग से मार डाला जो न तो सूखी होती है न गीली।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥