श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 42

 
श्लोक
अन्येऽप्येवं प्रतिद्वन्द्वान्वाय्वग्निवरुणादय: ।
सूदयामासुरसुरान् मृगान्केसरिणो यथा ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
अन्ये—अन्यों ने; अपि—भी; एवम्—इस प्रकार; प्रतिद्वन्द्वान्—विपक्षियों को; वायु—वायुदेव; अग्नि—अग्निदेव; वरुण- आदय:—वरुण देव तथा अन्य; सूदयाम् आसु:—तेजी से मारने लगे; असुरान्—सारे असुरों को; मृगान्—हिरनों को; केसरिण:—सिंह; यथा—जिस तरह ।.
 
अनुवाद
 
 वायु, अग्नि, वरुण इत्यादि देवता अपने विरोधी असुरों को उसी तरह मारने लगे जिस तरह जंगल में हिरनों को सिंह मारते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥