श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 45

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
संयम्य मन्युसंरम्भं मानयन्तो मुनेर्वच: ।
उपगीयमानानुचरैर्ययु: सर्वे त्रिविष्टपम् ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; संयम्य—रोककर; मन्यु—क्रोध का; संरम्भम्—वृद्धि, उभाड़; मानयन्त:— स्वीकार करते हुए; मुने: वच:—नारद मुनि के शब्द; उपगीयमान—प्रशंसित होकर; अनुचरै:—अनुयायियों द्वारा; ययु:—लौट गये; सर्वे—सारे देवता; त्रिविष्टपम्—स्वर्ग लोक को ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : नारद मुनि के वचनों को मानकर देवताओं ने अपना क्रोध त्याग दिया और लड़ाई बन्द कर दी। वे अपने अनुयायियों द्वारा प्रशंसित होकर स्वर्गलोक को लौट गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥