श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 47

 
श्लोक
तत्राविनष्टावयवान् विद्यमानशिरोधरान् ।
उशना जीवयामास संजीवन्या स्वविद्यया ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—उस पर्वत पर; अविनष्ट-अवयवान्—बचे हुए अंगों वाले मारे गए असुरों को; विद्यमान-शिरोधरान्—जिनके सिर उनके शरीरों में अभी तक लगे थे; उशना:—शुक्राचार्य; जीवयाम् आस—जीवित कर दिया; संजीवन्या—सञ्जीवनी मंत्र द्वारा; स्व विद्यया—अपनी विद्या से ।.
 
अनुवाद
 
 उस पर्वत पर शुक्राचार्य ने उन सारे मृत असुर सैनिकों को जिनके सिर, धड़ तथा हाथ- पाँव कटे नहीं थे जीवित कर दिया। उन्होंने अपने सञ्जीवनी मंत्र के द्वारा यह सब किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥