श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 5

 
श्लोक
आरुरुक्षन्ति मायाभिरुत्सिसृप्सन्ति ये दिवम् ।
तान्दस्यून्विधुनोम्यज्ञान्पूर्वस्माच्च पदादध: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
आरुरुक्षन्ति—व्यक्ति जो उच्च लोकों को जाना चाहते हैं; मायाभि:—तथाकथित योगशक्ति या विज्ञान के भौतिक विकास द्वारा; उत्सिसृप्सन्ति—या ऐसे झूठे प्रयासों से मुक्त होना चाहते हैं; ये—जो व्यक्ति; दिवम्—स्वर्गलोक को; तान्—ऐसे धूर्तों तथा लंठों को; दस्यून्—ऐसे चोरों को; विधुनोमि—मैं नीचे गिराता हूँ; अज्ञान्—मूर्ख; पूर्वस्मात्—पिछला; च—भी; पदात्—पद से; अध:—नीचे ।.
 
अनुवाद
 
 उन मूर्खों तथा धूर्तों को जो माया से या यांत्रिक साधनों से उच्चलोकों तक पहुँचना चाहते हैं या जो उच्चलोकों को भी पार करके वैकुण्ठलोक या मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं, मैं उन्हें ब्रह्माण्ड के सबसे निम्न भाग में भिजवाता हूँ।
 
तात्पर्य
 विभिन्न लोगों के लिए निस्सन्देह, भिन्न-भिन्न लोक हैं। जैसाकि भगवद्गीता (१४.१८) में कहा गया है—ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:—सतोगुणी पुरुष उच्चतर लोकों को जा सकते हैं। किन्तु जो रजोगुणी तथा तमोगुणी हैं उन्हें उच्चलोकों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। दिवम् शब्द उच्चलोकों का द्योतक है, जो स्वर्गलोक कहलाता है। स्वर्गलोक के राजा इन्द्र को अधिकार है कि यदि कोई बद्धजीव समुचित योग्यता के बिना निम्न लोकों से उच्चलोकों को जाने का प्रयास करे तो वह उसे नीचे धकेल दे। चन्द्रमा तक जाने का आधुनिक
प्रयास निम्न लोगों द्वारा कृत्रिम यांत्रिक साधनों से स्वर्गलोक जाने का ही प्रयास है। यह प्रयास सफल नहीं हो सकता। इन्द्र के इस कथन से लगता है कि जो यांत्रिक साधनों द्वारा, जिसे यहाँ पर माया कहा गया है, उच्चलोकों को जाने का प्रयास करता है उसे ब्रह्माण्ड के निम्न भागों में नरकलोक में भेज दिया जाता है। उच्चलोकों में जाने के लिए पर्याप्त सद्गुण चाहिए। तमोगुणी पापी पुरुष तथा मदिरा पान, मांस भक्षण तथा अवैध यौनाचार में लगा व्यक्ति कभी भी यांत्रिक साधनों से उच्चलोकों में प्रवेश नहीं करेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥