श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  »  श्लोक 7

 
श्लोक
श्रीबलिरुवाच
सङ्ग्रामे वर्तमानानां कालचोदितकर्मणाम् ।
कीर्तिर्जयोऽजयो मृत्यु: सर्वेषां स्युरनुक्रमात् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-बलि: उवाच—बलि महाराज ने कहा; सङ्ग्रामे—युद्धभूमि में; वर्तमानानाम्—यहाँ जो लोग उपस्थित हैं उनका; काल- चोदित—काल के प्रभाव से; कर्मणाम्—लडऩे या अन्य कार्यों में लगे मनुष्यों के लिए; कीर्ति:—यश; जय:—विजय; अजय:—हार; मृत्यु:—मृत्यु; सर्वेषाम्—सब की; स्यु:—होनी चाहिए; अनुक्रमात्—क्रमश: ।.
 
अनुवाद
 
 बलि महाराज ने उत्तर में कहा : सभी लोग जो इस युद्धभूमि में उपस्थित हैं निश्चय ही नित्य काल के वश में हैं और वे अपने-अपने नियत कर्मों के अनुसार क्रमश: यश, विजय, हार तथा मृत्यु प्राप्त करेंगे।
 
तात्पर्य
 यदि कोई युद्धभूमि में विजयी होता है, तो वह प्रसिद्ध हो जाता है, किन्तु यदि वह विजयी न होकर हार जाता है, तो वह मर सकता है। जीत या हार तो इस तरह के युद्ध में या जीवन संघर्ष के युद्धक्षेत्र में सम्भव है ही। सब कुछ प्रकृति के नियमों के अनुसार घटित होता है(प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै कर्माणि सर्वश:)। चूँकि, बिना किसी अपवाद के, हर जीव प्रकृति के गुणों के अधीन है अतएव विजयी या पराजित होना उसके वश में नहीं है अपितु वह प्रकृति के वश में होता है। इसलिए बलि महाराज अत्यन्त विचारवान् थे। वे जानते थे कि युद्ध शाश्वत
काल द्वारा नियोजित है और काल के वशीभूत होकर मनुष्य को अपने कर्मों का फल स्वीकार करना होता है। अतएव इन्द्र द्वारा यह धमकी दिये जाने पर भी कि वह बलि महाराज को वज्र से मार डालेगा, बलि महाराज रंचमात्र भी भयभीत नहीं हुए। यही क्षत्रिय धर्म है—युद्धे चाप्यपलायनम् (भगवद्गीता १८.४३)। क्षत्रिय को सभी परिस्थितियों में, विशेषकर युद्धभूमि में, अत्यन्त सहनशील होना चाहिए। अत: बलि महाराज ने बता दिया कि यद्यपि स्वर्ग का राजा जैसा व्यक्ति उन्हें धमका रहा है, किन्तु वे मृत्यु से तनिक भी भयभीत नहीं हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥