श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 11: इन्द्र द्वारा असुरों का संहार  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में बताया गया है कि महान् मुनि नारद को उन असुरों पर अत्यधिक दया आई जो देवताओं द्वारा मारे गये थे। अत: उन्होंने देवताओं को इस रक्तपात को बन्द करने के लिए कहा। तब शुक्राचार्य ने अपनी योगशक्ति से सभी असुरों को जीवनदान दिया।
भगवान् का समर्थन होने से देवतागण इन असुरों से नये जोश से पुन: लडऩे लगे। राजा इन्द्र ने बलि पर अपना वज्र चलाया और जब बलि गिर गये तो उनके मित्र जम्भासुर ने इन्द्र पर आक्रमण कर दिया, किन्तु इन्द्र ने अपने वज्र से उसका सिर काट दिया। जब नारद मुनि ने सुना कि जम्भासुर मारा गया है, तो उन्होंने नमुचि, बल तथा पाक को सूचित किया जो उसके सम्बन्धी थे। तब ये तीनों युद्धक्षेत्र में गये और इन्होंने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। इन्द्र ने बल तथा पाक के सिर काट दिये और नमुचि के कंधे पर कुलिश नाम का वज्र-रूपी हथियार छोड़ा। किन्तु यह कुलिश वज्र असफल होकर वापस आ गया जिससे इन्द्र खिन्न हो गया। उस समय आकाश से एक अदृश्य वाणी सुनाई पड़ी वाणी ने घोषणा की, “नमुचि को शुष्क या नम हथियार नहीं मार सकता।” यह वाणी सुनकर इन्द्र सोचने लगा कि नमुचि का संहार कैसे हो? तब उसके मन में झाग का विचार आया जो न तो शुष्क होता है, न नम। इस झाग के हथियार का उपयोग करके वह नमुचि को मारने में सफल रहे। इस प्रकार इन्द्र तथा अन्य देवताओं ने अनेक असुर मार गिराये। तब ब्रह्मा के आग्रह पर नारद मुनि देवताओं के पास गये और उन्हें मना किया कि अब वे असुरों का वध करना बन्द कर दें। तब सारे देवता अपने- अपने धामों को चले गये। किन्तु युद्ध-स्थल पर जितने असुर जीवित बचे थे वे सब नारद के आदेशानुसार बलि महाराज को अस्ताचल पर्वत पर ले गये। वहाँ पर शुक्राचार्य के कर-स्पर्श से बलि महाराज को फिर से चेतना आ गई और जिन असुरों के सिर तथा शरीर पूरी तरह नष्ट नहीं हुए थे उन सब को शुक्राचार्य ने अपनी योग-शक्ति से पुन: जीवित कर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥