श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 12: मोहिनी-मूर्ति अवतार पर शिवजी का मोहित होना  »  श्लोक 14

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
एवमभ्यर्थितो विष्णुर्भगवान् शूलपाणिना ।
प्रहस्य भावगम्भीरं गिरिशं प्रत्यभाषत ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; अभ्यर्थित:—प्रार्थना किये जाने पर; विष्णु: भगवान्— भगवान् विष्णु ने; शूल-पाणिना—त्रिशूलधारी शिवजी द्वारा; प्रहस्य—हँसते हुए; भाव-गम्भीरम्—अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक; गिरिशम्—शिवजी को; प्रत्यभाषत—उत्तर दिया ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब त्रिशूलधारी शिवजी ने भगवान् विष्णु से इस तरह प्रार्थना की तो वे गम्भीर होकर हँस पड़े और उन्होंने उनको इस प्रकार से उत्तर दिया।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु योगेश्वर कहलाते हैं। यत्र योगेश्वर: कृष्ण:। योगीजन योगाभ्यास द्वारा कुछ शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु भगवान् कृष्ण तो योग शक्ति के ईश्वर कहलाते हैं। शिवजी उस मोहिनी-मूर्ति को देखना चाहते थे जिससे सारा जगत मोहित था और भगवान् विष्णु इस विचार में मग्न थे कि शिवजी को भी किस तरह मोहा जाये। इसलिए भावगम्भीरम् शब्द का
प्रयोग हुआ है। माया को दुर्गादेवी द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, जो गिरिश या शिवजी की पत्नी हैं। शिव दुर्गाजी द्वारा मोहित नहीं हो पाये थे, किन्तु अब जब वे भगवान् विष्णु के स्त्री-रूप को देखना चाह रहे थे तो भगवान् विष्णु अपनी योग-शक्ति से ऐसा रूप धारण करेंगे जो उनको भी मोह सके। इसीलिए भगवान् विष्णु गम्भीर थे और साथ ही हँसते जा रहे थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥