श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 12: मोहिनी-मूर्ति अवतार पर शिवजी का मोहित होना  »  श्लोक 39

 
श्लोक
को नु मेऽतितरेन्मायां विषक्तस्त्वद‍ृते पुमान् ।
तांस्तान्विसृजतीं भावान्दुस्तरामकृतात्मभि: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
क:—क्या; नु—निस्सन्देह; मे—मेरा; अतितरेत्—पार पा सकता है; मायाम्—माया को; विषक्त:—भौतिक इन्द्रिय-भोग में आसक्त; त्वत्-ऋते—आपके अतिरिक्त; पुमान्—व्यक्ति; तान्—ऐसी दशाओं; तान्—आसक्त पुरुषों को; विसृजतीम्—पार कर सकने में; भावान्—भौतिक कार्यकलापों के फलों को; दुस्तराम्—पार कर पाना दुष्कर; अकृत-आत्मभि:—अपनी इन्द्रियों को वश में करने में असमर्थ व्यक्तियों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रिय शम्भु! इस भौतिक जगत में तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो मेरी माया से पार पा सके? सामान्यतया लोग इन्द्रियभोग में आसक्त रहते हैं और इसके प्रभाव में फँस जाते हैं। निस्सन्देह, उनके लिए माया के प्रभाव को लाँघ पाना अत्यन्त कठिन है।
 
तात्पर्य
 तीन प्रमुख देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर में से विष्णु को छोडक़र सभी माया के वश में हैं। चैतन्य-चरितामृत में उन्हें मायी कहा गया है, जिसका अर्थ है “माया के प्रभाव में।” किन्तु यद्यपि शिवजी माया के संग रहते हैं, वे उससे प्रभावित नहीं होते। सारे जीव
माया द्वारा प्रभावित होते हैं, किन्तु शिवजी माया के साथ रहते हुए भी प्रभावित नहीं होते। दूसरे शब्दों में, इस संसार में शिवजी के अतिरिक्त सारे जीव माया द्वारा विचलित हो जाते हैं। अतएव शिवजी न तो विष्णु-तत्त्व हैं न जीवतत्त्व। वे इन दोनों के बीच में हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥