श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 12: मोहिनी-मूर्ति अवतार पर शिवजी का मोहित होना  »  श्लोक 5

 
श्लोक
आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहि: ।
यतोऽव्ययस्य नैतानि तत् सत्यं ब्रह्म चिद्‌भवान् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
आदि—प्रारम्भ; अन्तौ—तथा अन्त; अस्य—इस व्यक्त जगत का या किसी भी भौतिक या दृश्य वस्तु का; यत्—जो; मध्यम्— आरम्भ एवं अन्त के मध्य, पालन; इदम्—यह दृश्य जगत; अन्यत्—आपके अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु; अहम्—गलत धारणा; बहि:—आपसे बाहर; यत:—के कारण; अव्ययस्य—अक्षय; न—नहीं; एतानि—इतने सारे अन्तर; तत्—वह; सत्यम्—परम सत्य; ब्रह्म—ब्रह्म; चित्—आध्यात्मिक; भवान्—आप ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्! व्यक्त, अव्यक्त, मिथ्या अहंकार तथा इस दृश्य जगत का आदि (उत्पत्ति), पालन तथा संहार सभी कुछ आपसे है। किन्तु आप परम सत्य, परमात्मा, परम ब्रह्म हैं अतएव जन्म, मृत्यु तथा पालन जैसे परिवर्तन आप में नहीं पाये जाते।
 
तात्पर्य
 यतो वा इमानि भूतानि जयन्ते—वैदिक मंत्रों के अनुसार प्रत्येक वस्तु भगवान् से उद्भूत है। भगवद्गीता (७.४) में स्वयं भगवान् कहते हैं—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

“पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार—ये आठ मिलकर मेरी भिन्न। भौतिक शक्तियाँ बनाते हैं।” दूसरे शब्दों में, दृश्य जगत के अवयव भी भगवान् की शक्ति से बने हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं होता कि चूँकि सारे अवयव उनसे प्राप्त होते हैं अतएव भगवान् अब पूर्ण नहीं रहे हैं। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते—चूँकि वे पूर्ण इकाई हैं, अतएव भले ही उनसे अनेक पूर्ण इकाइयाँ क्यों न उद्भूत हों, वे पूर्ण बने रहते हैं। इस तरह भगवान् अवयव अर्थात् अक्षम कहलाते हैं। जब तक हम परम सत्य को अचिन्त्यभेदाभेद नहीं मान लेते तब तक हमें परम सत्य की स्पष्ट धारणा नहीं हो सकती। भगवान् हर वस्तु के मूल हैं। अहमादिर्हि देवानाम्—वे समस्त देवताओं के मूल कारण हैं। अहं सर्वस्य प्रभव:—उन्हीं से हर वस्तु उद्भूत होती है।

सभी दशाओं में, हम इस समग्र दृश्य जगत में चाहे जो भी धारणा करें वह वास्तव में भगवान् है। उनके लिए “यह मेरा है तथा यह किसी अन्य का है” में कोई अन्तर नहीं होता क्योंकि वे सब कुछ हैं। इसीलिए वे अव्यव कहलाते हैं जिसका अर्थ है परिवर्तनरहित तथा न समाप्त होने वाला। चूँकि भगवान् अव्यय हैं अतएव वे परम सत्य हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥