श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 12: मोहिनी-मूर्ति अवतार पर शिवजी का मोहित होना  »  श्लोक 6

 
श्लोक
तवैव चरणाम्भोजं श्रेयस्कामा निराशिष: ।
विसृज्योभयत: सङ्गं मुनय: समुपासते ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तव—तुम्हारे; एव—निस्सन्देह; चरण-अम्भोजम्—चरणकमल; श्रेय:-कामा:—चरम कल्याण रूपी जीवन के चरम लक्ष्य के इच्छुक व्यक्ति; निराशिष:—बिना किसी भौतिक इच्छा के; विसृज्य—त्यागकर; उभयत:—इस जीवन में तथा अगले जीवन में; सङ्गम्—आसक्ति; मुनय:—मुनिगण; समुपासते—पूजा करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जो शुद्ध भक्त या महान् सन्त पुरुष (मुनिगण) जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करने के इच्छुक हैं तथा इन्द्रियतृप्ति की समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित हैं, वे आपके चरणकमलों की निरन्तर भक्ति में लगे रहते हैं।
 
तात्पर्य
 जब मनुष्य सोचता है कि, “मैं यह शरीर हूँ और इससे सम्बन्धित हर वस्तु मेरी है” तो वह भौतिक जगत में होता है। अतो गृहक्षेत्रसुताप्त वित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति। यह भौतिक जीवन का लक्षण है। भौतिकतावादी जीवन की धारणा होने पर मनुष्य सोचता है कि, “यह मेरा घर है, यह मेरी जमीन है, यह मेरा परिवार है, यह मेरा प्रान्त है।” किन्तु जो लोग मुनय: हैं अर्थात् जो नारद मुनि के पदचिह्नों का अनुगमन करने वाले सन्त पुरुष हैं, वे बिना किसी इन्द्रियतृप्ति की इच्छा के भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं। अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञान कर्माद्यनावृतम्। चाहे यह जीवन हो, या अगला जीवन, ऐसे सन्त भक्तों की एकमात्र चिन्ता भगवान् की सेवा करने के लिए रहती है। अत: वे इतने भी परम होते हैं क्योंकि उन्हें अन्य कोई इच्छा नहीं सताती। भौतिक इच्छा के द्वन्द्वों से मुक्त होने के वे कारण श्रेयस् कामा: कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में, उन्हें
धर्म, अर्थ या काम से कोई प्रयोजन नहीं रहता। ऐसे लोगों की एकमात्र चिन्ता मोक्ष भी है। यह मोक्ष ब्रह्म से तदाकार होना नहीं है जैसाकि मायावादी चिन्तक मानते हैं। चैतन्य महाप्रभु ने बतलाया कि वास्तविक मोक्ष का अर्थ है भगवान् के चरणकमलों की शरण में जाना। उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य को उपदेश देते हुए इस तथ्य को स्पष्ट तौर पर बतलाया था। सार्वभौम भट्टाचार्य श्रीमद्भागवत के मुक्ति-पदे शब्द को शुद्ध करना चाहते थे, किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बताया कि श्रीमद्भागवत के किसी भी शब्द को सुधारने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने समझाया कि मुक्तिपदे भगवान् विष्णु के चरणकमलों का सूचक है, जो मुक्ति के दाता हैं और इसलिए मुकुन्द कहलाते हैं। शुद्ध भक्त को भौतिक वस्तुओं से कोई सरोकार नहीं रहता। वह धर्म, अर्थ या काम के लिए भी चिन्तित नहीं रहता। वह एकमात्र भगवान् के चरणकमलों की सेवा करने में रुचि रखता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥