श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 12: मोहिनी-मूर्ति अवतार पर शिवजी का मोहित होना  »  श्लोक 7

 
श्लोक
त्वं ब्रह्म पूर्णममृतं विगुणं विशोक-
मानन्दमात्रमविकारमनन्यदन्यत् ।
विश्वस्य हेतुरुदयस्थितिसंयमाना-
मात्मेश्वरश्च तदपेक्षतयानपेक्ष: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—आप; ब्रह्म—सर्वव्यापी परम सत्य; पूर्णम्—परम पूर्ण; अमृतम्—कभी नष्ट न होने वाले; विगुणम्—प्रकृति के गुणों से मुक्त, आध्यात्मिक रूप से स्थित; विशोकम्—शोक रहित; आनन्द-मात्रम्—सदैव दिव्य आनन्द से युक्त; अविकारम्— परिवर्तनरहित; अनन्यत्—हर वस्तु से पृथक्; अन्यत्—फिर भी सब कुछ हो; विश्वस्य—दृश्य जगत के; हेतु:—कारण; उदय— प्रारम्भ के; स्थिति—पालन; संयमानाम्—तथा विश्व के विभिन्न विभागों को नियंत्रण में रखने वाले समस्त निदेशकों में से; आत्म-ईश्वर:—हर एक को निर्देश देने वाले परमात्मा; च—भी; तत्-अपेक्षतया—हर व्यक्ति आप पर आश्रित है; अनपेक्ष:— सदैव पूर्णत: स्वतंत्र ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु! आप परब्रह्म तथा सभी प्रकार से पूर्ण हैं। पूर्णत: आध्यात्मिक होने के कारण आप नित्य, प्रकृति के भौतिक गुणों से मुक्त तथा दिव्य आनन्द से पूरित हैं। निस्सन्देह, आपके लिए शोक करने का प्रश्न ही नहीं उठता। चूँकि आप समस्त कारणों के परम कारण हैं अतएव आपके बिना कोई भी अस्तित्व में नहीं रह सकता। फिर भी जहाँ तक कारण तथा कार्य का सम्बन्ध है हम आपसे भिन्न हैं क्योंकि एक दृष्टि से कार्य तथा कारण पृथक्-पृथक् हैं। आप सृष्टि, पालन तथा संहार के मूल कारण हैं और आप समस्त जीवों को वर देते हैं। हर व्यक्ति अपने कार्यों के फलों के लिए आप पर निर्भर है, किन्तु आप सदा स्वतंत्र हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.४) में भगवान् कहते हैं—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

“यह सारा ब्रह्माण्ड मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सारे जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।” इससे अचिन्त्य-भेदाभेद अर्थात् एकसाथ एकत्व तथा भिन्नता दर्शन की व्याख्या हो जाती है। प्रत्येक वस्तु परम ब्रह्म है; फिर भी परम पुरुष हर वस्तु से पृथक् स्थित है। निस्सन्देह, हर भौतिक वस्तु से पृथक् स्थित होने के कारण वे परम ब्रह्म, परम कारण तथा परम नियन्ता हैं। ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द-विग्रह:। भगवान् परम कारण हैं और उनके स्वरूप को प्रकृति के भौतिक गुणों से कोई सरोकार नहीं रहता। भक्त प्रार्थना करता है “जिस तरह आपका भक्त समस्त इच्छाओं से पूर्णत: रहित है उसी प्रकार आप भी इच्छाओं से पूर्णतया मुक्त हैं। आप पूर्णत: स्वतंत्र हैं। यद्यपि सारे जीव आपकी सेवा में लगे रहते हैं, किन्तु आप किसी की सेवा पर आश्रित नहीं हैं। यद्यपि यह संसार पूरी तरह से आपके द्वारा सृजित है, किन्तु सब कुछ आपकी स्वीकृति पर निर्भर करता है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति आप ही से उत्पन्न हैं। स्वतंत्र रूप से कुछ भी नहीं किया जा सकता, किन्तु आप अपने सेवकों द्वारा की गई सेवा पर आश्रित न रहते हुए स्वतंत्र होकर कर्म करते हैं। सारे जीव अपनी मुक्ति के लिए आपकी कृपा पर आश्रित रहते हैं, किन्तु जब आप उन्हें मुक्ति देना चाहते हैं, तो आप किसी अन्य पर आश्रित नहीं रहते। निस्सन्देह, अपनी अहैतुकी कृपा से आप किसी को भी मुक्ति दे सकते हैं। जिन्हें आपकी कृपा प्राप्त होती है वे कृपासिद्ध कहलाते हैं। सिद्धि-पद को प्राप्त करने में अनेकानेक जन्म लग जाते हैं। (बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते)। फिर भी कठोर तपस्या किये बिना ही आपकी कृपा से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। भक्ति को अहैतुकी होना चाहिए और अवरोधों से मुक्त (अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति)। यही निराशिष: पद है अर्थात् सभी प्रकार के फलों की आशा से मुक्ति। शुद्ध भक्त निरन्तर आपकी दिव्य प्रेमाभक्ति करता है, किन्तु आप उसकी सेवा पर आश्रित न रहकर किसी पर भी कृपा कर सकते हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥