श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 13: भावी मनुओं का वर्णन  »  श्लोक 11

 
श्लोक
अष्टमेऽन्तर आयाते सावर्णिर्भविता मनु: ।
निर्मोकविरजस्काद्या: सावर्णितनया नृप ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
अष्टमे—आठवें; अन्तरे—मन्वन्तर में; आयाते—आने पर; सावर्णि:—सावर्णि; भविता—हो जायेगा; मनु:—आठवाँ मनु; निर्मोक—निर्मोक; विरजस्क-आद्या:—विरजस्क इत्यादि; सावर्णि—सावर्णि के; तनया:—पुत्र; नृप—हे राजा ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा! आठवें मनु का काल आने पर सावर्णि मनु बनेगा। निर्मोक, विरजस्क इत्यादि उसके पुत्र होंगे।
 
तात्पर्य
 इस समय वैवस्वत मनु का शासन है। ज्योतिषगणना के अनुसार हम वैवस्वत मनु के अट्ठाइसवें युग में हैं। प्रत्येक मनु इकहत्तर युगों तक रहता है और ब्रह्माजी के एक दिन में ऐसे चौदह मनु शासन चलाते हैं। इस समय हम सातवें मनु वैवस्वत के युग में हैं और आठवाँ
मनु लाखों वर्ष बाद आयेगा। लेकिन शुकदेव मुनि ने अधिकारियों से सुन रखा था जिसके आधार पर वे भविष्यवाणी करते हैं कि आठवाँ मनु सावर्णि होगा और उसके पुत्रों में निर्मोक तथा विरजस्क होंगे। शास्त्र यह बता सकते हैं कि लाखों वर्ष बाद क्या होगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥