श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 13: भावी मनुओं का वर्णन  »  श्लोक 13

 
श्लोक
दत्त्वेमां याचमानाय विष्णवे य: पदत्रयम् ।
राद्धमिन्द्रपदं हित्वा तत: सिद्धिमवाप्स्यति ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
दत्त्वा—दान में देकर; इमाम्—इस समग्र ब्रह्माण्ड को; याचमानाय—उससे याचना करने वाले; विष्णवे—भगवान् विष्णु को; य:—बलि महाराज; पद-त्रयम्—तीन पग भूमि; राद्धम्—प्राप्त किया; इन्द्र-पदम्—इन्द्र का स्थान; हित्वा—त्यागकर; तत:— तत्पश्चात्; सिद्धिम्—सिद्धि; अवाप्स्यति—प्राप्त करेगा ।.
 
अनुवाद
 
 बलि महाराज ने भगवान् विष्णु को तीन पग भूमि दान में दी जिसके कारण उन्हें तीनों लोक खोने पड़े। किन्तु बाद में बलि द्वारा सर्वस्व दान दे दिये जाने पर जब भगवान् विष्णु प्रसन्न हुए तो बलि महाराज को जीवन की सिद्धि प्राप्त हो जाएगी।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.३) में कहा गया है—मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये—लाखों लोगों में से कोई एक जीवन सिद्धि के लिए प्रयास करता है। यहाँ पर इस सिद्धि का वर्णन है। राद्धमिन्द्रपदं हित्वा तत: सिद्धिमवाप्स्यति। सिद्धि तो
भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त करने में है, योगसिद्धियों में नहीं। योगसिद्धियाँ—अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता—क्षणिक हैं। चरमसिद्धि तो भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त करना है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥