श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 13: भावी मनुओं का वर्णन  »  श्लोक 14

 
श्लोक
योऽसौ भगवता बद्ध: प्रीतेन सुतले पुन: ।
निवेशितोऽधिके स्वर्गादधुनास्ते स्वराडिव ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
य:—बलि महाराज; असौ—वही; भगवता—भगवान् द्वारा; बद्ध:—बाँधा जाकर; प्रीतेन—प्रेम के कारण; सुतले—सुतललोक में; पुन:—फिर; निवेशित:—स्थित; अधिके—अधिक ऐश्वर्यवान्; स्वर्गात्—स्वर्ग की अपेक्षा; अधुना—इस समय; आस्ते— स्थित हैं; स्व-राट् इव—इन्द्र के पद के समान ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने प्रेमपूर्वक बलि को बाँध लिया और फिर उन्हें सुतल राज्य में अधिष्ठित किया जो स्वर्गलोक की अपेक्षा अधिक ऐश्वर्यशाली है। इस समय बलि महाराज उसी लोक में रहते हैं और इन्द्र की अपेक्षा अधिक सुखी हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥